Srishti Khanda Extracted Page 888

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-888

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Sanskrit Original

ज्य Ss SS hb सृष्टिखण्ड ८६३ प्रदद्यातां धनं पुत्रान् सुखं सौभाग्यमेव च । आकृष्णेति रवेर्मत्र इमंदेवास्तथा विधोः ॥३०॥ अभ्निमूर्धेति भौमस्य मंत्रो जप्येर्हणे तथा । उद्दध्यस्वेतींदुसूनो बृहस्पते गुरोस्तथा ॥३९॥ अन्नात्परीति शुक्रस्य शन्नोदेवीरयं शनेः । कयान इति राहोश्च केतोः केतुमितिस्मृतः ॥३२॥ एते मंत्रा स्समुद्दिष्टा ग्रहाणां पूजने जपे । एवंकृते नृपश्रेष्ठानुकूला अखिला ग्रहाः ॥३३॥ भवंति पुंसां सततं यच्छंति च सुसंपदः । एतन्महाराज मया समस्तं तुभ्यं समुद्दिष्टमिहक्रमेण॥३४॥ श्रुत्वा नरः सर्वश्रुतार्थसारमेतीश्वरस्यैव च सन्निधानम् । इदं पवित्रं यशसोनिधानमिदं पितृणामतिवल्लभं स्यात् ॥३५॥ इदंच देवेष्वमृताय कल्पते पुण्यावहं पातकिनां च पुंसाम् । इति पठति यशस्यं यः शृणोतीह भक्त्या मधुमुरनरकारेरर्चनं वाथ पश्येत् ॥३६॥ मति मपिच जनानां योददातीद्रलोके विधिशिवविबुधेनदरैः पूज्यते कल्पमेकम् । य इदं श्ृणुयान्नित्यमृषीणां चरितं शुभम् ॥३७॥ विमुक्तस्सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोके महीयते। तपः कृते प्रशंसंति त्रेतायां ज्ञानमेव च ॥३८॥ द्वापरे यज्ञमित्याहुदनमेकं कलौ युगे । सर्वेषामेव दानानामिदमेवैकमुत्तमम्॥ ३ ९॥ अभयं सर्वभूतानां नास्तिदानमतः परम् । दानं प्रधानं शूद्रस्य त्वित्याह भगवान्प्रभुः ॥४०॥ दानेन सर्वकामाप्तिस्तस्य संजायते तपः । पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् ॥४ १॥ के आकार का बनाना चाहिए । केतु की पूजा तथा उनका वर्ण शनि के ही समान होता है ॥२८॥ केतु का दान सप्तघान्य तथा सुवर्ण बतलाया गया है । हे भीष्म ! ऐसा करने से राहु और केतु दोनों पूजा करने वाले के अनुकूल होकर ॥२९॥ धन, पुत्र, सुख तथा सौभाग्य प्रदान करते हैं । सूर्य का मन्त्र अकृष्णेन इत्यादि है, और चन्द्रमा का मन्त्र इमं देवा० इत्यादि है ।।३०।। भौम का जपने योग्य मंत्र अग्निमूर्धा० इत्यादि है, इसी से भौम की पूजा भी करे । वुध का मंत्र-उद्टूध्यस्व० इत्यादि है और गुरु का मन्त्र बृहस्पते अति० इत्यादि है ॥३ १॥ शुक्र का मन्त्र अन्नात् परि० इत्यादि है तथा शनि का मन्त्र शन्नो देवी इत्यादि हैं । राहु का मन्त्र कयान इत्यादि है तथा केतु का मन्त्र केतो कृण्वन् इत्यादि है ॥३१-३२॥ ग्रहों के पूजन और जप के लिए ये ही मन्त्र बतलाये गये है । हे नृपश्रेष्ठ ! ऐसा करने से सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं और आराधक को सदा सम्पति प्रदान करते है । हे महाराज! इस प्रकार से इन सारी बातों को मैने आपको क्रमशः वतलाया ॥३३-३४॥ समस्त श्रुत अर्थो के सार का श्रवण करके मनुष्य ईश्वर के सन्निधान को प्राप्त करता है । यह आख्यान अत्यन्त पवित्र, यश का आकर तथा पितरों को प्रिय हैं ॥३५॥ यह देवताओं को अमृत के समान प्रिय है तथा पातकियों को पुण्य प्रदान करने वाला है । इस यश प्रदान करने वाले आख्यान को जो पढता अथवा सुनता है तथा मधु, मुर एवं नरकासुर (भौमासुर) के शत्रु श्रीहरि की पूजा का जो दर्शन करता है ॥३६॥ जो इसका ज्ञान लोगों को प्रदान करता है, वह ब्रह्मा, शिव तथा देवेन्द्र के द्वार एक कल्प पर्यन्त पूजित होता है । जो मनुष्य इस ऋषियों के चरित का श्रवण करता है ॥३७॥ वह सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक में पूजित होता है । सत्ययुग में तपस्या की प्रशंसा होती है, त्रेता में ज्ञान की ही प्रधानता होती है, द्वापर में यज्ञ को मुक्ति का साधन बतलाया गया है और कलियुग में केवल दान की ही महत्ता होती है । सभी दानो में सर्वोत्तम दान सभी भूतों को अभय प्रदान बतलाया गया है । अभय दान से वढकर कोई दूसरा दान नहीं है। भगवान् ने शूद्रों के लिए सभी समयों में दान को ही प्रधान वतलाया है ॥३८-४०॥ शूद्र की सारी कामनाएँ दान से

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