Srishti Khanda Extracted Page 887

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-887

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Sanskrit Original

प्रीपदागहापुराण पंचकोणं समुष्दिष्टं मंडलं भार्गवस्य तु । चूर्णकैः श्वेतवर्णैश्च विधिना सुधियाकृतम्॥१४॥ श्वेतगंधैश्च पुष्पैश्च वख्नैश्चापि सितैस्तथा । पूजयेद्धार्गवं भक्त्या नरः श्रब्द्ासमन्वितः ॥१५॥ रौप्यंच दक्षिणादानं यथाशक्ति प्रकीर्तितम् । दशाद्यरिष्टे चोत्पन्ने सितमश्चं प्रदापयेत् ॥१६॥ तंडुलाः श्वेतवस्त्रंच रौप्यं चंदनमेव च। कर्पूर सुगंधाक्यं देयं दानं द्विजातये॥१७॥ भृगुपुत्र महाभाग दानवानां पुरोहित। दानेनानेन संतुष्टो भव सर्वासुरार्चित ॥१८॥ इति मंत्रं समुच्चार्य दद्याद्दानं यथोदितम्। तस्य॒ तुष्टो भवत्याशु भार्गवः कुरुनंदन ॥१९॥ शनैश्चरस्य पूजार्थं मंडलं च नराकृति । कृत्वा चूर्णैः कृष्णवर्णः पूजयेत् तत्र भक्तितः ॥२०॥ कृष्ण गन्धैश्च पुष्पैश्च वस्रैश्चापि तथाविधैः । लोहं च दक्षिणादानं पिण्याकं च तिलस्यच॥२१॥ दानंशनैश्चरारिष्टे कृष्णां गां कृष्णवस्तरकैः । सुवर्णं च यथाशक्ति दद्यात्रीलमणिं तथा॥२२॥ सूर्यसूनो महाभाग छायापुत्र महाबलः | अयोदृष्टे भव शने प्रसन्नोऽस्मात्प्रदानतः ॥२३॥ एवं स्तुत्वा शनिं भक्त्या यश्च दद्याद् द्विजातये। स्वानुकूलो भवेत्तस्य शनिः पापे च गोचरे ॥२४॥ राहोर्वर्णादिकं सर्वशनिवन्मंडलं तथा। सूर्यकारं समुदिष्टं तत्र पूजार्कसूनुवत् ॥२५॥ गोमेदं सर्षपाश्चैव तिला माषाश्च कृष्णकाः । महिषी च तथाच्छागो दानं राहोः प्रकीर्तितम् ॥२६॥ सिंहिकासुत दैत्येंद्र राहोचंद्रार्कमर्दन । भवतुष्टो महाभाग दानेनानेन सुब्रत ॥२७॥ केतोर्मडलकं कुर्यदध्वजाकृति सुशोभनम्। शनिवत्सकलं ` ज्ञेयं पूजावर्णादिकं तृप ॥२८॥ सप्तधन्यं समुद्दिष्टं सस्वर्णं केतुदानकम् । एवं कृते स्वानुकूलौ भवेतां च नृणां तृप ॥२९॥ करने से मनुष्य की सारी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं ॥१२॥ हे राजन् ! इस समय मैं शुक्र की भी पूजा वतलाता हूँ। उस पृजन को करके मनुष्य की सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति हो जाती हैं ॥१३॥ शुक्र का मण्डल पाँच कोणों वाला बतलाया गया है । उसे श्वेत चूर्ण से बनाना चाहिए ॥१४।। श्रद्धा सम्पन्न पुरुष को चाहिए कि वह शुक्र की पूजा श्वेत चन्दन, शेत पुष्प तथा श्वेत वस्न से करे ॥१५॥ इसकी दक्षिणा भी आपनी शक्ति के अनुसार चाँदी ही देनी चाहिए । शुक्र की दशा अरिष्ट होने पर ब्राह्मण को श्वेत घोड़ा का दान देना चाहिए ॥१६॥ किञ्च व्राह्मण को श्वेत चावल श्वेत वस्न, चाँदी, श्वेत चन्दन, सुगन्धित कर्पूर का दान देना चाहिए ॥१७॥ फिर प्रार्थना करे कि हे महाभाग ! महर्षि भृगु के पुत्र तथा दैत्यों के पुरोहित एवं सभी असुरों से पूजित शुक्राचार्य इस दान से आप सन्तुष्ट होएँ ॥१८॥ इस मंत्र को पढकर ही यथेष्ट दान देना चाहिए । हे कुरुनन्दन ! ऐसा करने से शुक्र प्रसन्न हो जाते हैं ॥१९॥ शनैश्वर की पूजा के लिए काले चूर्ण से मनुष्य के आकार का मण्डल बनाकर भक्तिपूर्वक ॥२०॥ उसी में शनि की पूजा काले चन्दन, पुष्प, काले वस्त्र से करे और तिल का लडडू एवं लोहे का दान करना चाहिए ॥२१॥ शनिश्चर के अरिष्ट होने पर आपनी शक्ति के अनुसार काली गौ, काले वस्र, नीलमणि तथा सुवर्ण का दान देना चाहिए ॥२२॥ उसके बाद स्तुति करे हे छाया देवी के गर्भ से उत्पन्न महाबलवान् सूर्य पुत्र महाभाग शनि मेरे द्वारा दिये गये इस दान के प्रभाव से आप मेरे लिए अधोदृष्टि हो जायं । इस प्रकार से स्तुति करके जो ब्राह्मण को दान देता है, उसके लिए पाप गोचर में विद्यमान शनि अनुकूल हो जाते हैं ॥२३-२४॥ राहु के वर्ण आदि सब कुछ शनि के समान होते हैं । राहु का मण्डल सूर्पाकार होता हे । राहु की पूजा भी शनि के ही समान होती है । राहु के लिए दान गोमेद, सरसो, तिल, काली उड़द, भैंस तथा बकरे का दान बतलाया गया है ॥२५-२६॥ उसके बाद प्रार्थना करे हे सूर्य तथा चन्द्रमा को पीडित करने वाले सिंहिका पुत्र दैत्येन्द्र राहो इस दान से आप सन्तुष्ट हो जायँ ॥२७॥ केतु का सुन्दर मण्डल ध्वज बळी र

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