Srishti Khanda Extracted Page 886
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-886
Sanskrit Original
बयासीवाँ अध्याय भोष्म उवाच श्रुतं सूर्यस्य चंद्रस्य भौमस्यापि प्रपूजम्। बुधस्य सोमसूनोश्च पूजनं कथयाधुना ॥९॥ पुलस्त्य उवाच तारागर्भसमुद्धतो वुधश्चंद्र कुमारकः । सौम्यः क्रूरो ग्रहो ज्ञेयः शुभाशुभप्रदो नृणाम् ॥२॥ शराकारं मंडलं तु बुधस्य परिकीर्तितम् । हरिन्मणिसमैर्वणै श्चूर्णैः कुर्यात्तुमंडलम् ॥३॥ पूजयेत्तत्र गंधाद्यौः पुष्पैर्धूपैस्सुशोभनैः। दानं च विधिवत्कुर्याद्दशारिष्टे च गोचरे ॥४॥ कर्पूराश्चैव मुद्राश्च हरिद्दस्त्रं हरिन्मणिः। सुवर्ण च यथाशक्ति दद्याद्वोधनतुष्टये॥५॥ सोमपुत्रमहाप्राज्ञ वेदवेदांगपारग । नमस्ते ग्रहमध्यस्थ प्रसन्नो भव मे सदा॥६॥ इति स्तुत्वा महाराज बुधभक्तद्या समाहितः । प्रापरुयान्निखिलान्कामान्सोमसूनुप्रसादतः ॥७॥ गुरोश्च पूजनं प्रोक्तं पट्टसाकारमंडले। पीतवर्ण: सुनिष्पत्नै चूर्णे राजन् सुशोभनैः ॥८॥ पीतैर्गधयुतैः पुष्पैर्वस्रै्हेप्ना च पूजयेत् । दशागोचरयोदौष्ट्ये दानं दद्याच्च शक्तितः॥९॥ चणकद्विदलं चैव पीतवस्त्रं सुवर्णकम्। पुष्परागं तुविप्राय दद्याच्चारिष्टशांतये ॥१०॥ बृहस्पते सुराचार्य सर्वशास्त्रविशारद । दानेनानेन संतुष्टो भव सौम्यो ममाधुना ॥१९॥ एवं कृते तु राजेंद्र स्वानुकूलो भवेद्दुरुः । सर्वान्कामानवाप्रोति नरो गुरुसमर्चनात् ॥१२॥ भार्गवस्यापि वक्ष्यामि पूजनं नृपतेऽधुना। यत्कृत्वा सर्वकामाप्तिः सम्यक्युसां प्रजायते ॥१३॥ पुराणावतार वर्णन तथा सभी ग्रहों की पूजा का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- मैने सूर्य, सोम तथा भौम की भी पूजा का वर्णन सुन लिया । अब आप सोमके पुत्र बुध के पूजन विधि को वतलायें ॥१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- चन्द्रमा के पुत्र बुध तारा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे । वुध को सौम्य तथा क्रूर दोनों प्रकार का ग्रह समझना चाहिए यह मनुष्य को शुभ तथा अशुभ दोनों प्रदान करता है ॥२॥ बुध का मण्डल बाण के आकार का होता है । नीलमणि के समान हरे वर्ण के चूर्ण से बुध का मण्डल वनाना चाहिए ॥३॥ उसी में गन्ध, पुष्प तथा सुन्दर धूप से बुध का पूजन करना चाहिए । बुध की अरिष्ट दशा होने पर विधिपूर्वक कर्पूर, मूंग, हरा वस्त्र, हरी मणि, तथा सुवर्ण का अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए जिससे कि बुध प्रसन्न हों ॥५॥ उसके बाद वुध की स्तुति करे-- हे महाप्राज्ञ, सोमपुत्र, वेदों तथा वेदांगों के ज्ञाता बुध आपको नमस्कार है । आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥६॥ हे महाराज भक्ति पूर्वक बुध की इस तरह से स्तुति करके मनुष्य बुध की कृपा से अपने समस्त मनोरथों को पूर्ण कर लेता है !॥७॥ गुरु का पूजन पट्टिस के समान आकार वाले मण्डल में बतलाया गया है । गुरु का मण्डल पीले सुन्दर चूर्ण से बनाना चाहिए ॥८॥ गुरु की पूजा पीले, सुगन्धित पुष्पों तथा पीले वस्ब से करना चाहिए । गुरु की दशा और गोचर के अरिष्ट होने पर विधि पूर्वक शक्ति के अनुसार ब्राह्मण को दान देना चाहिए ॥९॥ चने की दाल, पीला वस्र, सुवर्ण तथा पुष्प रागमणि ब्राह्मण को दान करे। उसके वाद प्रार्थना करे हे सभी शास्त्रों में निपुण सुराचार्य बृहस्पति इस दान से सन्तुष्ट होकर आप मेरे लिए कल्याणकारी हो जायं ॥१०-११॥ हे राजेन्द्र ऐसा काने से बृहस्पति अनुकूल हो जाते हैं । वृहस्पति की पूजा
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