Srishti Khanda Extracted Page 885
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-885
Sanskrit Original
तस्य पूजा चतुर्थ्यांतु भौमवारे च सुव्रतैः। दशाद्यरिष्टे च तथा गोचरेऽनिष्टराशिगे ॥४२॥ त्रिकोणे मंडले चैव रक्तपुष्पानुलेपनैः । एवं वै पूजितो भौमः प्रयच्छति मतिं धनम् ॥४३॥ पुत्रान्सुखं यशश्चैव किंभूय: श्रोतुमिच्छसि । व्यास उवाच एतद्वः कथितं शिष्या धर्माख्यानं शुभावहम् ॥४ ४॥ यच्छुत्वा न पुनर्भूयो जायते प्रियतेपि वा । द्विजातीनां पुण्यदंच संसेव्यं च शुभेप्सुभिः ॥४५॥ यथासुखं चगच्छध्वं कृतकृत्याममाज्ञया। ब्रह्मोवाच एवं विश्राव्य भगवान्व्यासः सत्यवतीसुतः ॥४६॥ निर्णीय धर्मविविधं शम्याप्रासमगात्सुत । त्वमपि श्रद्धया वत्स ज्ञात्वा तत्वं यथासुखम्॥४७॥ विहरस्व यथाकालं गायमानो हरिं मुदा । लोकान् धर्म चोपदिशन् प्रीणयन् जगतां गुरुम्॥४८॥ पुलस्त्य उवाच इत्युक्तः प्रययौ भूप नारदो गंधमादनम्। नारायणं मुनिवरं द्रष्टुं वदरिकाश्रमे॥४९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे भोमोत्पत्तिपूजनं नामैकाशीतितमोऽध्यायः ॥८ १॥ re होने तथा भौम के अनिष्ट राशि पर स्थित होने पर भौमवारी चतुर्थी तिथि को व्रत करना चाहिए ॥४२॥ त्रिकोणमण्डप रक्त चन्दन से बनाकर उसमें भौम की लाल पुष्प से पूजा करने पर भौम बुद्धि तथा धन प्रदान करते हैं ॥४३॥ वे पुत्र, सुख तथा यश को भी प्रदान करते है । अब क्या सुनना चाहते हो ? व्यासजी ने कहा-- हे शिष्यों ! मेंने तुमलोगों को यह धार्मिक आख्यान सुनाया ॥४४॥ इसका श्रवण करके मनुष्य जन्म मरण से मुक्ति पा लेता है । यह ब्राह्मणों को पुण्य प्रदान करने वाला है । अतएव काल्याण चाहने वालों को इसका सेवन करना चाहिए ॥४५॥ अब आपलोग मेरी आज्ञा से अपने अभिप्रेत स्थान पर जायं । ब्रह्माजी ने कहा-- इसतरह सत्यवती के पुत्र भगवान् व्यासजी अपने शिष्यों को प्रेषित करके तथा अनेक धर्मो का निर्णय करके शम्याप्रास चले गये । हे वत्स नारदजी भी श्रद्धा पूर्वक तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करके अपने मनोनुकूल श्रीहरि का कीर्तन करते हुए लोगों को धर्मोपदेश करते हुए तथा श्रीभगवान् को प्रसन्न करते हुए विचरण करने लगे ॥४६-४८॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा- हे भीष्मजी ! ब्रह्माजी के इसतरह से कहने पर नारदजी बदरिकाश्रम में भगवान् बदरीनारायण का दर्शन करने के लिए गन्धमादन पर्वत पर चले गये ॥४९॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के भौम की उत्पत्ति तथा पूजन वर्णन नामक एकासौवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ८ १।। — $e
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