Srishti Khanda Extracted Page 884
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-884
Sanskrit Original
ततो नंदीश्वरः श्रीमान्पार्वतीपतिनेरितः । काव्यं तं कुंतले धृत्वा दैत्यानां पुरतो बलात् ॥२७॥ आनयंतं च तं दैत्या जध्नुः प्रहरणै शरैः । न शेकुस्ते रुजां कर्तृ नंदिनो बलशालिनः॥२८॥ देवानामग्रतो नंदी गृहीत्वा तं च कुंतले । हरस्य पुरतो. हृष्ट सह तेन समाययौ॥२९॥ गृहीत्वा भार्गवं शंभुरसुराणां गुरूं रुषा। अगिलद्रौद्रमूर्तोसौ कालांतकसमः प्रभुः ॥३०॥ ततो दैत्यपतिः क्कुछ: सर्वसैन्यवृतोबली । दुद्राव शंकरं तत्र घोरैः प्रहरणादिभिः॥३१९॥ त्रिदशाश्च तथा क्कुद्धास्ततो विद्याधरादयः । प्रययुः समरं तत्र दैत्यानां च भृशं रुषा ॥३२॥ एतस्मिन्नंतरे घोरं युद्धं भीष्मं समुत्थितम् । देवदानवयोरेवं सर्वलोक भयङ्करम् ॥३३॥ ततः प्रत्यतितास्त्रेश्न देवा निघ्नन्ति दानवान् । दनुजा निर्जरांस्तत्र विनिध्नंति महाहवे ॥३४॥ शातकुं भमयाङ्गैस्ते शरैर्वज्रसमानकैः। बिभिदू रत्मपुंखैश्च परस्परजयैषिणः ॥३५॥ दीपयंति भृशं कांतैस्तद्वात्राणि नभांसि च। वीर्यवंतो महादैत्यानमोधैरस्त्रासंचयैः ॥३६॥।। हत्वा च पातयामासुः काश्यपाः सुरसत्तमाः। जगद्वयाप्तं महासैऱ्यं बलायुधसुसंवृतम् ॥३७॥ नीतं क्षयं सुरैः सर्वैः शस्त्रैः प्रत्ययितैः क्षणात्। स्वयंच युध्यमानेन महादेवेन यत्नतः ॥३८॥ शूलोद्धतोपि सुचिरमविनष्टोऽथ नम्रधीः। अन्धको गणतां नीत्वा कृतोभृंगीरिटिर्िजि ॥३९॥ ततो देवान् समाभाष्य शुक्रमुद्गीर्णवान् शिवः । भूमौ निपतितो गर्भस्ततो भौम इति स्मृतः ॥४ ०॥ शुक्रश्शिवं समाभाष्य गतो दैत्यान्मुदान्वितः । एवं भौमस्समुत्पन्नो हरांशो भूसमुद्धव: ॥४९॥ नन्दीश्वर दैत्यों के सामने ही शुक्राचार्य के केश को पकड़कर लाने लगे । उस समय दैत्यों ने उनके ऊपर अखों तथा शख्रो से प्रहार किया । किन्तु बलशाली नन्दी को वे घायल नहीं कर सके ॥२७-२८॥ देवताओं के ही सामने नन्दी शुक्राचार्य के वालों को पकड़कर प्रसन्नता पूर्वक अनेक देवताओं के साथ शङ्करजी के सामने आ गये ॥२९॥ क्रुद्ध शङ्करजी काल तथा यमराज के समान रौद्र रूप धारण किए हुए शुक्राचार्य को पकड़कर निगल गये ॥३०॥ उसके बाद दैत्यराज अन्धक सेना के साथ क्रुद्ध होकर भयङ्कर शस्रों से सजकर शङ्करजी के समक्ष आ गया ॥३१॥ उस समय देवता तथा विद्याधर आदि भी क्रुद्ध होकर समराङ्गण में दैत्यों के विरुद्ध आ गये ॥३२॥ और उस समय भयङ्कर घोर युद्ध देवताओं और दैत्यों में होने लगा ॥३३॥ उस समय देवता अपने विश्वस्त शस्रों से देत्यों को मार रहे थे और दानव भी उस महायुद्ध में देवताओं को मार रहे थे ॥३४॥ परस्पर में एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने की इच्छा से सुवर्ण निर्मित, वज्र के समान भयङ्कर तथा जिनके पुंख रत्नों के बने थे ऐसे बाणों से एक दूसरे को छेद रहे थे ॥३५॥ वे बाण अपनी कान्ति से शरीरों तथा आकाश को प्राकाशित कर रहे थे । पराक्रमी देवता अपने अमोघ अखों से दैत्यों को मारकर गिरा दिए । जगत् में व्याप्त तथा बल एवं आयुध से युक्त सेना को देवताओं ने अपने विश्वस्त शस्त्रों से क्षणभर में विनष्ट कर दिया और स्वयं सप्रयास युद्ध करते हुए शङ्करजी के द्वारा ॥३६-३८॥ त्रिशूल से दबाये रहने पर अन्धक मरा नहीं वह विनीत हो गया और शङ्करजी ने उसको अपना भृङ्गीरिटी नामक गण बना दिया ॥३९॥ उसके बाद देवताओं से बात करके महादेव ने शुक्राचार्य को उगल दिया । वह गर्भ पृथिवी पर गिरकर भौम ग्रह बन गया ॥४०॥ शुक्राचार्य भी शिवजी से बातें करके प्रसन्नता पूर्वक दैत्यों के पास चले गये । इसतरह शङ्करजी के अंशभूत भौम ग्रह पृथिवी से उत्पन्न हुआ ॥४१॥ सुन्दर व्रत वाले लोगों को भौम ग्रह की दशा
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