Srishti Khanda Extracted Page 883
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-883
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुरण कुर्वे लोकहितार्थाय श्रद्धां कामसमन्विताम्। विचिकित्सा तु तत्रैव सर्वास्त्रीरतिगच्छति ॥९२॥ त्यक्त्वैकां पार्वती दुर्गा न तस्य मानस स्थिरम् । ततः क्रुद्धो जगत्स्वामी तं च वैरूप्यतां नयेत् ॥९३॥ ततोऽ सुरत्वं संत्यज्यगणस्तस्य भविष्यति । एवमुक्त्वा प्रजाध्यक्षः श्रद्धां कामसमन्विताम् ॥१४॥ विचिकित्सां स्वमायां च प्रेषयामास तं प्रति । ततोविचेष्टितः कामाद्योषान्वेषणतत्परः ॥१५॥ स्वदारान्परयोषां च नापश्यद्विचिकित्सया । ततो मायाप्रयुक्तो सौ त्रैलोक्यं विचचार ह ॥१६॥ दृष्टं च हिमवत्तृष्ठे स्त्रीरत्नं चातिशोभनम् । दृष्ट्वा च पार्वतीं दैत्य; कामस्य वशगोऽ भवत्॥१७॥ ज्ञानलोपात्ततो दुर्गा ग्रहीतुं तां सचेच्छति। उमा च कोटवी रूपं कृत्वादेहस्य चात्मनः ॥१८॥ ईश्वरस्यातिकस्था च ग्रहीतुं तां ससार सः । ततः कामविचेताश्च उन्मतीकृतचेतनः ॥१९॥ न जहाति शिवां घात्रीं पार्वतीं दैत्यपुंगवः । ततोध्यानात्समागम्य मिलितः पार्वतीं धवः ॥२०॥ दृष्ट्वा तं च स दैत्येन्द्रः प्रगतस्तु स्वमालयम् । सज्जीकृत्य स्वयोधांश्च शंभुं जेतुं समुत्सुकः॥२९॥ गौरीमेवसमानेतुं काममोहादचेतनः । एतच्छुत्वातु त्रिदशा गत्वा तं नंदिनेरिताः॥२२॥ अकुर्वश्च महद्युद्धं घोरं लोकभयंकरम्। दैत्यात्रणे मृतांस्तत्र दैत्याचार्योह्मजीवयत् ॥२३॥ एतद् वृत्तं तु कैलासे सर्वे चैवन्यवेदयन् । क्रोधाच्छंभुस्तदा वाक्यं नंदिनं निजगादह॥२४॥ गच्छदैत्यालयं वीर द्वुतमेव ममाज्ञया । पश्यतां सर्वदैत्यानां दैत्येंद्रस्य च संसदि ॥२५॥ गृहीत्वा चिकुरेऽत्यर्थं भार्गवं तं दुरात्मकम् । लघ्ब्वा चाम्स्मत्सकाशं वै विह्वलं चानय क्षणात्॥२६॥ लिए करूँगा । उसी के विषय में विचार करना है । वह सभी खियों से प्रेम करता है ॥१२॥ वह केवल दुर्गा स्वरूपिणी पार्वती को प्राप्त करने की इच्छा नहीं करना चाहता है । यदि वह उनको चाहने लगे तो जगत् के स्वामी शङ्करजी उसको विरूप बना दें ॥१३॥ उसके बाद वह अपनी आसुर भावना को त्याग देगा और शङ्करजी उसे अपना गण बना देंगे । इसतरह से कहकर ब्रह्माजी ने कामयुक्त श्रद्धा ॥१४॥ विचिकित्सा तथा अपनी माया को अन्धकासुर के प्रति प्रेरित किया । विचिकित्सा के कारण वह अपनी पत्नियों तथा दूसरों की पत्नियों का विचार नहीं करता था । उसके बाद वह कामुक बना हुआ सदा रमणियों का अन्वेषण करने लगा ॥१५॥ उसके बाद वह माया से प्रेरित होकर त्रैलोक्य में विचरण किया ॥१६॥ उसने हिमालय पर अत्यन्त सुन्दर स्त्री को देखा । पार्वतीदेवी को देखकर वह अत्यन्त कामुक बन गया ॥१७॥ ज्ञान का लोप हो जाने के कारण वह पार्वती देवी का अपहरण करना चाहा । उमा ने भी अपने शरीर को स्यारिन का रूप बना दिया ॥१८॥ भगवान् शिव के सन्निकट विद्यमान पार्वतीजी को पकडने के लिए वह वहाँ गया । उस समय कामार्त होने के कारण वह उन्मत्त हो गया था ॥१९॥ उसने जगन्माता पार्वतीजी को पकड़ लिया और उन्हें छोड़ता भी नहीं था उसके बाद ध्यान करके पार्वती देवी अपने पति से मिल गयीं ॥२०॥ शङ्करजी को देखकर वह दैत्यराज अपने घर चला गया और शङ्करजी को परास्त करने के लिए उत्सुक बना हुआ वह अपनी सेना को पार्वतीजी को ही प्राप्त करने के लिए सज्जाया । इस समाचार को सुनकर नन्दी के द्वारा प्रेरित सभी देवता ॥२१-२२॥ शङ्करजी के पास जाकर अन्धकासुर से महायुद्ध करने लगे, वह युद्ध अत्यन्त भयङ्कर था । मरे हुए दैत्यों को दैत्याचार्य जीवित कर देते थे ॥२३॥ इस वृत्तान्त को सबों ने कैलास जाकर शङ्करजी को सुनाया । यह सुनकर क्रुद्ध हुए शङ्करजी ने नन्दी से कहा ॥२४॥ हे वीर ! मेरी आज्ञा से तुम शीघ्र ही अन्धकासुर के यहाँ जाओं और सबों के सामने दैत्यों की सभा में प्रवेश करके ॥२५॥ दुष्ट शुक्राचार्य का केश पकड़कर घसीटते हुए व्याकुल शुक्राचार्य को मेरे पास लाओ ॥२६॥ उसके बाद शङ्करजी के द्वारा प्रेरित होकर
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