Srishti Khanda Extracted Page 882
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-882
Sanskrit Original
एकासीवाँ अध्याय वैशंपायन उवाच उद्धवं लोहितांगस्य संतोषं तु जनेषु च। प्रभाव वैभवं तेजः श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥९॥ व्यास उवाच हरांशसंभवो देवः कुजातः पृथिवीसुतः । सत््वस्थस्सत्वसंपूर्णश्शूरः शक्तिधरो भुवि ॥२॥ तीक्ष्णः क्रूरग्रहो देवो लोहितांगः प्रतापवान्। कुमारो रूपसंपन्नो विद्युत्पातमयः प्रभुः ॥३॥ अनेन भर्जिता दैत्याः क्रव्यादा ये सुरद्विषः। दशयोगाच्च मनुजा उद्धिज्जाः पशुपक्षिणः ॥४॥ वैशंपायन उवाच शंभोरेष कथं जात: कथंजातो महीसुतः । ग्रहो देवः कथं क्रूर एतदिच्छामि वेदितुम्॥५॥ कथमस्य भवेत्तुष्टिः सर्वलोकेषु सर्वदा। गुरो मय्याप्तभावे तु वद निस्संशयं मुखात् ॥६॥ व्यास उवाच हिरण्याक्षकुले धीमानसुराणां च पार्थिवः । अंधकेति समाख्यातो दैत्यः सर्वसुरांतकृत् ॥७॥ जातो विष्णुवरादेव जातो विष्णुपराक्रमः । तेनैव निर्जिता देवास्सेन्द्राः क्रतुभुजः क्रमात् ॥८॥ ततो देवा विधिं गत्वा वचनं चेदमब्रुवन् । अन्धकेनैव चास्माकं हतं राज्यं सुखं मखः॥९॥ तस्मात्तस्य वधोपाय उच्यतां तद्विधीयताम् । अथ धाताब्रवीद्वाक्यं देवानस्य च नैधनम् ॥१०॥ ब्रह्मोवाच नास्ति विष्णुवरादेव पीयूषस्य च भक्षणात् । किंतु तस्यासुरत्वस्य यथा परिभवो ध्रुवम् ॥१९॥ भौम की उत्पत्ति तथा भौम की पूजा का वर्णन वैशम्पायन महर्षि ने कहा-- मैं भौम की उत्पत्ति, उनकी सन्तुष्टि तथा मनुष्यों पर भौम के प्रभाव, वैभव तथा तेज को सुनना चाहता हूँ ॥१॥ व्यासजी ने कहा-- भौम देवता शङ्करजी के अंश से उत्पत्र पृथिवी के पुत्र हैं। वे सत्त्वगुण सम्पन्न, बल सम्पन्न, शूरवीर तथा शक्तिधारण करने वाले हैं ॥२॥ प्रतापी भौम तीक्ष्ण तथा क्रूर ग्रह हैं । कुमार रूपवान् तथा विद्युत् के उत्पात स्वरूप हैं ॥३॥ इन्होंने दैत्यों को, भूंज कर मांस भक्षियों को दे दिया भौम की दशा में मृत मनुष्य उद्भिज तथा पशु-पक्षी होते हें ॥४॥ वैशम्पायन महर्षि ने कहा-- भौम शङ्करजी से कैसे उत्पन्न हुए तथा कैसे परथिवी पुत्र हुए ? ये क्रूर ग्रह कैसे हो गये ? इस बात को में जानना चाहता हूँ ॥५। भौम की सभी लोगों पर सर्वकालिक तुष्टि कैसे होती है ? हे गुरो ! इसे आप मुझे बतलाइये, मैं आपका आप्ततम शिष्य हूँ ॥६॥ व्यासजी ने कहा-- हिरण्याक्ष के वंश में असुरों का राजा बुद्धिमान् अन्धकासुर उत्पन्न हुआ । वह सभी देवताओं को मार देता था ॥७॥ भगवान् विष्णु का वरदान प्राप्त होने के कारण विष्णु के ही समान पराक्रम वाला वह इन्द्र आदि सभी देवताओं को क्रमश: पराजित कर दिया ॥८॥ उसके बाद सभी देवताओं ने ब्रह्माजी के पास जाकर कहा कि अन्धकासुर ने हमलोगों के राज्य, सुख तथा यज्ञभाग को छिन लिया है ॥९। अतएव आप उस उपाय को बतलाइये जिससे उसका वध हो जाय, उसके बाद ब्रह्माजी ने अन्धकासुर के निधन का उपाय बतलाया।।१०॥ ब्रह्माजी ने कहा-- भगवान् विष्णु के वरदान को प्राप्त करके उसने अमृत का पान कर लिया है, अतएव उसकी मृत्यु तो नहीं हो सकती है; किन्तु उसकी आसुर भावना वदल जाय ॥११॥ ऐसा उपाय मैं लोक कल्याण करने के १०८
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