Srishti Khanda Extracted Page 881
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-881
Sanskrit Original
ठप्प श्रीपद्यमहापुराण एवं यः पूजयेत्सोमं श्रावयेच्च शृणोति वा । स पीयूषसमो लोके भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥२१॥ | एवं सहस्रनाम्ना यः स्तौति पूजयते भुवि । सोऽक्षयं लभते स्वर्गं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥२२॥ इति सोमपूजा पित्तले भाजने कांस्ये दधिपूर्णे घृते शिवे । न्यूनोऽधिकस्तुविभवाच्छुत्वा कर्मविमत्सरः ॥२३॥ स्वर्णे वा राजते वारे सौम्ये कृष्णभवे बुधम् । संस्थाप्य सर्वसंस्थाने दद्याद्वृहुसुताय च ॥२४॥ परं भवति सौभाग्यं पीयूषादधिकं भृशम्। सत्रीणां च पुरुषाणां च नदौर्भाग्यं कदाचन. ॥२५॥ रूपसौभाग्यकामोऽहं दधिपूर्णं च भाजनम्। ददामिकांस्यपात्रस्थं देहिसौभाग्यरूपकम् ॥२६॥ द्विजाय वाक्य पूर्वेण दद्याद्विमत्सरो नरः । शक्तितो दक्षिणा देया तथा वस्त्रदिकं नवम् ॥२७॥ भोज्यान्नं सर्वसंपूर्ण तांबूलं सुमनोहरम् । पुष्पमालादिकं दद्याद्रूपसौ भाग्यहेतवे ॥२८॥ एवं यः कुरुते दानं सोमोद्दिष्टं द्विजातये । स्वलोके नरलोके वा रूपसौभाग्यभुग्मवेत् ॥२९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे सोमार्चनं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥॥८ ०॥ rte रात्रि में बतलाते हैं ॥२०॥ ओम् हां हीं सोमाय नम: यह सोम का जपने योग्य मन्त्र हैं । इसको प्रातःकाल जपना चाहिए । जो इस प्रकार से सोम की पूजा करता है, इस प्रसंग को सुनता और सुनाता है वह प्रत्येक जन्मो में अमृत के समान होता है ॥२१॥ जो सहस्र नाम से चन्द्रमा की स्तुति करता है अथवा पूजा करता है । वह पुनरावृत्ति से रहित दुर्लभ स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥२२॥ इसतरह से सोम पूजा पूरी हुयी । पीतल के अथवा कांसे के दधिपूर्ण पात्र में अथवा घी से भरे पात्र में चन्द्रमा को रखकर इसका श्रवण करके मनुष्य न्यूनाधिक ऐश्वर्य को प्राप्त करता है॥२३॥ बहुत पुत्रों को प्राप्त करने के लिए सोमवार की कृष्णजन्माष्टमी के दिन सोने अथवा चाँदी के पात्र में चन्द्रमा को रखकर दान करना चाहिए ॥२४॥ ऐसा करने वाला अमृत से भी अधिक सौभाग्य को प्राप्त करता है चाहे स्री हो अथवा पुरुष उसको कभी दौर्भाग्य नहीं होता है ॥२५॥ उस समय रूप तथा सौभाग्य प्राप्त करने की इच्छा से कांस्यपात्र में स्थित सौभाग्य स्वरूप दधि मैं दान करता हूँ हे चन्द्रदेव ! आप मुझे सौभाग्य तथा रूप प्रदान करें॥२६।। इस वाक्य को पढकर बिना किसी मत्सर के उसे ब्राह्मण को देना चाहिए । अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए तथा नवीन वस्न इत्यादि देना चाहिए।।२७॥ सभी प्रकार के अन्नों से परिपूर्ण सुन्दर भोजन तथा सुन्दर पान देना चाहिए । रूप तथा सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पुष्पमाला आदि देना चाहिए ।।२८॥ इस तरह से सोम की प्रसन्नता के लिए जो ब्राह्मण को दान देता है, वह स्वर्गलोक तथा मनुष्य लोक में रूप तथा सौभाग्य से सम्पत्र होता है ॥२९॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टि खण्ड के सोमार्चन नामक अस्सीवें अध्याय काशिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।८ ०।। —— re
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