Srishti Khanda Extracted Page 880

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-880

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Sanskrit Original

शांतये सर्वरोगाणां वधबंधविमोचने। एकैकेन तु मंत्रेण होतव्यं च शतं शतम् ॥७॥ शितं च च्छागलं दद्यात्सूरायादित्यवासरे । भोजयेद्वाह्मणान्शक्तया हव्यकव्यैर्मनोहरैः ॥८॥ सप्तम्यां च सिते पक्षे पंचदश्यां तथैव च । रोगाद्विमुच्यते रोगी न रोगात्कृच्छूमेष्यति॥९॥ परमं चामरं सत्वमाब्रहास्तंबमात्रके । ब्रह्मांडे चाणुमात्रे च सूरः संभावयिष्यते ॥१०॥ संहारांतं क्रमात्सर्वमुत्पत्तिस्थितिकारणात् । प्राणसर्गे जनानां सपाता विश्वचरस्तनौ॥११॥ मृत्युकाले तनोर्मध्यात्प्राणेन सह गच्छति । शीर्षान्तस्थः सदा चंद्रो द्विरष्टकलया युतः ॥१२॥ अहर्निशं सुधावृष्टिं देहे वर्षत्यधोमुखः । जंतवस्तेन जीवंति महासत्वानुमात्रकाः ॥१३॥ उर्व्यां सस्यानि पुष्णाति तथास्थावरजंगमान् । एताभ्यां पुष्पवद्भ्यांच धारितं जनितं जगत् ॥१४॥ तयोराराधनात्पुष्टि: सदापुण्या परार्धिका। साधयेत्सर्वकार्याणि साधकः सर्वदा शुचिः ॥१५॥ न पूजयति यो मोहात्सुधांशुं मानवाधमः। आयुस्तस्यक्षयं याति नरकं चाधिगच्छति॥१६॥ निष्कलंक कलाधार गंगाधर शिरोमणे। द्वितीयायां जगन्नाथ तुभ्यं चंद्र नमोस्तु ते॥१७॥ तिथिमन्यामनुप्राप्य नमस्कारं विधोरपि। प्रकरोति नरो यस्तु सोऽ भीष्टं फलमाप्नुयात् ॥१८॥ अत्रिनेत्रोद्धव श्रीमन् क्षीरोदमथनोद्भव । महेशमुकटावास तुभ्यं चंद्र नमोस्तु ते ॥१९॥ दिव्यरूपनमस्तुभ्यं सुधाकर जगत्पते । शुक्लपक्षे तथाकृष्णे त्रियामायां विदुर्बुधाः ॥२०॥ ॐ हां हीं सोमाय नमः इति जप्यमंत्रः । प्रभाते जपनीयः ॥ शान्ति के लिए तथा बध एवं वन्धन मे मुक्ति पाने के लिए सौ-सौ आहुतियाँ देनी चाहिए ॥७॥ रविवार को सूर्य के लिए श्वेत बकरे की बलि देनी चाहिए और अपनी शक्ति के अनुसार मनोहर हव्यों एवं कव्यों से ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए ॥८॥ शुक्लपक्ष की सप्तमी तथा पूर्णिमा को ब्राह्मण भोजन कराकर मनुष्य रोग से मुक्ति प्राप्त कर लेता है । रोगी मनुष्य रोगजन्य कष्ट को नहीं प्राप्त करता है ॥९॥ उत्कृष्ट चामर सूर्य को प्रदान करने से ब्रह्माजी से लेकर तृण पर्यन्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सूर सम्पूर्ण जीवों को प्रसन्न करते हैं ॥१०॥ संहार काल पर्यन्त सम्पूर्ण उत्पत्तियों तथा स्थिति का कारण होने के कारण सूर्य लोगों के प्राण सर्ग में सम्पूर्ण जीवों के शरीर में रहकर उनकी रक्षा करते हैं॥११॥ मृत्यु के समय सूर शरीर से प्राण के साथ निकलकर चले जाते है । मनुष्यों के शिर के अन्तिम भाग में चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ विराजमान रहते हें ॥१२॥ वे नीचे की ओर मुख करके रात-दिन अमृत की वर्षा करते रहते है । उसी के कारण अणु परिमाण वाले जीव जीवित रहते हैं ॥१३॥ चन्द्रमा पृथिवी पर सस्यं को तथा स्थावर जंगम जीवों को पुष्ट बनाते हैं । इन दोनो पुरुषों के सदृश ग्रहों के द्वारा सम्पूर्ण जगत् जीवित रहता है ॥१४॥ अतएव इन दोनों की आराधना करनी चाहिए पुण्यों से ही अधिक पुष्टि होती है । उपासक पुरुष सदा पवित्र रहकर अपने समस्त कार्यो को सिद्ध कर लेता है ॥१५। जो अधम मनुष्य अज्ञान के कारण चन्द्रमा की पूजा नहीं करता है। उसकी आयु क्षीण हो जाती है और वह नरक में जाता है ॥१६॥ पूजा के समय निष्कलंक कलाधार इत्यादि मंत्र को पढना चाहिए । हे निष्कलंक कलाओं को धारण करने वाले भगवान् शिव के शिरोमणि स्वरूप, हे जगन्नाथ आज द्वितीया तिथि को आप को नमस्कार है ॥१७॥ द्वितीया से भिन्न दूसरी तिथि को भी जो चन्द्रमा को देखकर नमस्कार करता है, वह अपने अभीष्ट फल को प्राप्त करता है । महर्षि अत्रि के नेत्र से उत्पन्न होने वाले श्रीमन् क्षीर सागर के मन्थन काल में उत्पन्न होने वाले, तथा महेश के मुकुट पर रहने वाले चन्द्रदेव आपको नमस्कार है ॥१९॥ हे दिव्यरूप वाले, जगत् के स्वामिन् सुधाकर आपको नमस्कार है । विद्वज्जन आपको शुक्लपक्ष तथा कृष्ण पक्ष दोनों में

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