Srishti Khanda Extracted Page 878

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-878

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Sanskrit Original

हविष्यान्नो निराहारो जनो यजति भास्करम्। एवमेव त्रिभिर्वगैरर्चितस्तै र्विभाकरः ॥२२॥ संतुष्टो भूपमागम्य कृपया चाब्रवीद्ठच:। वरं वरय चाभीष्टं यस्ते मनसि वर्तते॥२३॥ सर्वेषां वो हितार्थाय सानुगः पुरवासिनाम्। राजोवाच यदीच्छसि वरं दातुं सर्वलोचनमत्तप्रियम् ॥२४॥ सर्वेषां न: परं स्वर्ग त्वत्सकाशे भवत्विति । सूर्य उवाच आमात्यास्ते द्विजा विप्रा: सदारास्सपरिच्छदाः ॥२५॥ नवीनयौवनाः शुद्धा यावदाभूतसंप्लवम्। तिष्ठंतु मत्पुरे रम्ये सर्वभोगैर्निरामयाः ॥२६॥ सुरह्यमै: सुसंपूर्णैः प्रासादैर्हमकल्पकैः । प्रमदाभिर्महाभाग तृत्यगीतादिभिः परैः ॥२७॥ पंचकल्पांतरे राजा मन्वादौ त्वं भविष्यसि । अमीते मनुजा भूप पुरस्थाश्च पुरोधसः ॥२८॥ तथाजनपदस्थाश्च विद्वांसो धनिनो नराः । तत्र मत्तो वरं लब्ध्वा सुखं स्वर्गमवाप्स्यथ ॥२९॥ एवमुक्त्वा जगच्चक्षुर्स्तत्रैवांतरधीयत । ततो भब्रेश्वरो राजा सपुरो दिवि मोदते॥३०॥ तत्र कींटादयो ये च ते पीता: ससुतादयः। स्वर्गे देवद्रुमे भोग्यं कुर्वति महदद्धुतम् ॥३१॥ एवमेव नृपा विप्रा मुनयश्शंसितव्रताः । ये च क्षत्रादयो वर्णास्सूरस्वर्गं ययुर्हृतम् ॥३२॥ कैश्चिदभ्यर्थितं वित्तं पुत्रदारास्तथापरैः । सुखं स्वर्ग तथारोग्यं भास्करस्य प्रसादतः ॥३३॥ पुण्यकूटमिदं भद्रं यः पठेन्मानवः शुचिः । सर्वपापक्षयस्तस्य रुद्रवत्पूजितो भुवि ॥३४॥ सूर्य की आराधना करते थे । इसतरह ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों के द्वारा पूजित होकर भगवान् सूर्य ॥२२॥ संतुष्ट हो गये और राजा के पास आकर कहे, तुम अपने मनोनुकूल वरदान माँगो ॥२३॥ जिससे कि तुम्हारे सभी अनुचरों के साथ तुम्हार कल्याण हो । राजा ने कहा-- हे सबों के नेत्र स्वरूप ! यदि आप मुझको प्रिय वरदान देना चाहते हैं ॥२४॥ तो आपके सन्निकट ही हमलोगों को श्रेष्ठ स्वर्ग प्राप्त हो । सूर्य ने कहा-- तुम्हारे मंत्री, पुरोहित आदि अपनी पत्नियों तथा परिच्छदों के साथ ॥२५॥ नवीन जवानी प्राप्त करके शुद्ध रूप से कल्प पर्यन्त मेरे मनोहर लोक में निरोग होकर निवास करें ॥२६॥ हे महाभाग ! देववृक्षों तथा कल्पवृक्षों से परिपूर्ण, नृत्य गीतादि परायण प्रमदाओं आदि से भरे हुए प्रासादों में उनका निवास हो ॥२७॥ पाँच कल्प के बाद तुम मन्वादि में राजा होओगे । हे राजन्! ये तुम्हारे नगर में रहने वाले लोग तथा पुरोहित ॥२८॥ जनपद के सभी विद्वान्, धनिक पुरुष मुझसे वरदान प्राप्त करके समी स्वर्ग में चले जायेगें ॥२९॥ इसतरह से कहकर जगत् के नेत्र स्वरूप भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये। तब से राजा भद्रेश्वर अपने सभी लोगों के साथ स्वर्ग में आनन्दानुभव करते हैं ॥३०॥ वहाँ पर जो कीड़े इत्यादि थे वे अपने पुत्रों आदि के साथ वहाँ के देव वृक्षों में अत्यन्त अद्भुत रस का पान करते हैं ॥३१॥ हे ब्रिपों! इसीतरह से क्षत्रिय आदि राजागण तथा प्रख्यात ब्रत वाले मुनिगण सूर्य के लोक में शीघ्र ही चले गये ॥३२॥ कुछ लोगों ने वित्त, पुत्र पत्नी को सूर्य से माँगा, दूसरे लोगों ने सूर्य की कृपा से स्वर्ग, सुख तथा भोग्य पदार्थों को माँगा॥३ ३॥ जो मनुष्य इस लोक में कल्याणकारी तथा पुण्यपुझ स्वरूप इस प्रसंग का पाठ करेगा, उसके सारे पाप विनष्ट हो जायेंगे और वह रुद्र के समान पूजित होगा ॥३४॥ वह सर्वसाक्षी भगवान् सूर्य के लोक में उनका प्रिय

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