Srishti Khanda Extracted Page 877
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-877
Sanskrit Original
सूरं मंत्रैर्महादेवं यत्नादाराधय प्रभो । राजोवाच केनोपयेन विप्रद्रास्तोषयिष्यामि भास्करम् ॥८॥ अमेध्येनाथकुष्ठेन लोकानां गर्हितेन च । अदृश्यः सर्वभूतानां गर्हितोस्मि द्विजातयः ॥९॥ किं करिष्यामि राज्यं च किं स्यादाराधनेन तु । द्विजा ऊचुः अत्र स्थित्वा स्वराज्ये तु समुपास्य विरोचनम् ॥९०॥ प्रमुच्य किल्विषाद्धोरात्स्वर्ग मोक्षं च लप्स्यसे । एतच्छुत्वा तु राजेंद्र: प्राणिपत्य द्विजोत्तमान् ॥९१॥ आकार्षीत्तस्थ सूर्यस्य परमाराधनं च यत् । नित्यपूजां तथा मंत्रैरुपहारैर्विलेपनैः ॥१२॥ फलैर्नानाविधैरर्धैर क्षतातपतंडुलैः । जपापुष्पार्कपर्णैश्च करवीरकरंजकैः ॥१३॥ रक्तकुकुमसिन्दूरैस्तथावासंतिकादिभिः । सुगंधकदलीपत्रैस्तत्फलैः सुमनोहरैः ॥१४॥ अर्धघ्यमौदुंबरे कृत्वा सदा सूर्याय पार्थिवः । आदित्यसंमुखे दत्ते सदा मंत्रिपुरोहितैः ॥१५॥ महिषीभिस्तथाचाघों भोगिनीभिः समंततः । सर्वैरन्तः पुरस्थैश्च सपत्नीकैश्च रक्षिभिः ॥१६॥ चेटवर्गैस्तथान्यैश्च॒ दीयतेर्घो दिने दिने । आर्कशांतिभिरत्युग्रैः स्तोत्रमंत्रादिभिः परैः ॥१७॥ मूलमंत्रान्यमंत्रैश्च यजंतिस्म दिवाकरम् । तथार्कागब्रतं चान्यत्कृतं तैः सुसमाहितैः ॥१८॥ क्रमात्समां समासाद्य रोगस्यांतं गतो नृपः । बाधिते चामये घोरे स राजा निखिलं जगत् ॥१९॥ नियम्यकारयामास कल्ये च याजनव्रतम्। एवमेव जपापुष्पं सुगंध कदलीफलम् ॥२०॥ बाणैर्जायाभिरालभ्यकर्मपर्णान्यपुष्पकम् । एवमेवमहापुण्यं कृत्वा सर्वजनप्रियम् ॥२९॥ अतएव हे राजन् ! आप ऐसा न कहें, इसका निदान हमलोग यह जानते हैं कि ॥७॥ आप सप्रयास मन्त्रों के द्वारा सूर्य की आराधना करें । राजा ने कहा-- ब्राह्मणों मैं किस साधन से सूर्य को प्रसन्न करूँगा । इस लोक निन्दित तथा अमेध्य कुष्ठ के द्वारा अदृश्य रहकर मॅ राज्य और आराधना से क्या करूंगा ? ब्राह्मणों ने कहा-- आप अपने इस राज्य में रहकर सूर्य की उपासना करके ॥८-१०॥ इस भयङ्कर रोग से मुक्त होकर स्वर्ग तथा मोक्ष को प्राप्त करेंगे। यह सुनकर राजाने ब्राह्मणों को प्रणाम करके ॥११॥ सूर्य का परमाराधन किया । प्रतिदिन मंत्रं, उपहारो, विलेपनों ॥१२॥ फलों अनेक प्रकार के आर्घ्यो, साठी धान के चावलों, जपापुष्प, आक के पत्ते, करवीर और करञ्ज के लाल कुंकुम, सिन्दूर, वासन्तिक, सुगन्ध कदली पत्र, तथा मनोहर फल से ॥१३-१४॥ वह राजा गूलर के पेड़ पर सूर्य को अर्ध्य देते थे । उनके मंत्री और पुरोहित सूर्य के सामने अर्घ्य देते थे ॥१५॥ उनकी सारी रानियाँ सभी दासियाँ, जो अन्तःपुर में रहती थी वे सब तथा अन्तःपुर के सभी रक्षक अपनी पत्नियों के साथ ॥१६॥ सभी भृत्य तथा दूसरे लोग भी प्रतिदिन सूरयार्ध्य अत्यन्त उग्र अर्क शान्ति स्तोत्रों तथा मन्त्रो से देते थे ॥१७॥ वे सव सूर्य के मूलमंत्र तथा दूसरे मंत्रो से सूर्य की पूजा करते थे । उनलोगों ने सावधानी पूर्वक अर्काङ्ग सप्तमी व्रत भी किया॥१८॥ इसतरह वर्ष पूरा होते ही राजा का रोग विनष्ट हो गया । रोग के दूर जाने पर राजा ने सम्पूर्ण साम्राज्य में प्रात:काल सूर्य की पूजा तथा ब्रत का नियम कर दिया । इसीतरह से जपापुष्प, सुगन्ध कदली फल, सब सूर्य को निवेदित करते थे ॥१९-२०॥ बाणों तथा पत्लियो के द्वारा प्राप्य अर्क के पत्ते तथा पुष्प, भगवान् सूर्य को निवेदित करते थे । इसतरह सभी लोगों के प्रिय पुण्य को करके ।।२१॥ कुछ लोग हविष्यान्न खाकर कुछ लोग निराहार रहकर
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