Srishti Khanda Extracted Page 875

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-875

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Sanskrit Original

मंत्रश्चायं ॐ हां ह्वी सः सूर्याय नमः । अनेन मंत्रेण सदा सर्वसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्॥५०॥ व्याधयो वै न बाधंते नचानिष्टभयं भवेत् । सूर्यावर्तोदक यस्तु गृहीत्वा तु क्रमेण तु ॥५९॥ तस्य प्राशनमात्रेण नरो रोगात्प्रमुच्यते न दातव्यं नख्यातव्यं जप्तव्यं च प्रयत्नत: ॥५२॥ अभक्तेष्वनपत्येषु पाषण्डलौकिकेषु च । कटुतैलसमायुक्तं नस्ये पाने च दापयेत् ॥५३॥ सूर्यावर्तजलं पुत्र सर्वरोगाद्विमुच्यते। मूलमंत्रस्तु जप्तव्यः संध्यायां होमकर्मसु ॥५४॥ जप्यमाने तु नश्यंति रोगाः क्रूरग्रहास्तथा । किमन्यै र्बहुभिः शास्त्रैरमत्रे्वा बहुविस्तरैः ॥५५॥ सर्वशांतिरियं वत्स सर्वार्थप्रतिसाधिका । नास्तिकाय न दातव्या देवब्राह्मणनिंदके ॥५६॥ गुरुभक्ताय दातव्या नान्येभ्योपि कदाचन । प्रातरुत्थाय योनित्यं कीर्तयिष्यति मानवः ॥५७॥ गोध्न कृतध्नकश्चैव मुच्यते सर्वपातकैः । शरीरारोग्यकृच्चैव धनवृद्धियशस्करः ॥५८॥ जायते नात्र संदेहो यस्य तुष्येद्रिवाकरः। एककालं द्विकालं वा त्रिकालं नित्यमेव च ॥५९॥ यःपठेद्रविसान्निध्ये सोऽ भीष्टं फलमाप्नुयात् । पुत्रार्थी लभते पुत्रं कन्यार्थी कन्यकां लभेत्॥६०॥ विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्। श्ृणुयात्संयुतो भक्तया शुद्धाचारसमन्वितः ॥६१॥ सर्वपापविनिर्मुक्तस्सूर्यलोकं व्रजत्यपि । भास्करस्य व्रते यच्च तत्राचारमखेषु च ॥६२॥ पुण्यस्थानेषु तीर्थेषु पठेत्कोटिगुणं भवेत्। ग्रहे भोज्येषु पूजायां ब्रह्मभोज्येद्विजाग्रतः ॥६३॥ को सिद्ध करने वाले मूल मन्त्र को बतला रहा हूँ ॥४९। वह मन्त्र है ओम् हां हीं सः सूर्याय नमः इस मन्त्र से सर्वदा सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हें ॥५०॥ इसके जपने से व्याधियाँ वाधित नहीं करती हैं, किसी प्रकार के अनिष्ट का भय नहीं होता है जो व्यक्ति सूर्यावर्त को लेकर उसका प्राशन (आचमन) करता है वह रोग मुक्त हो जाता है । अतएव इस मन्त्र को किसी को न तो देना चाहिए और न बतलाना चाहिए, प्रयत्न पूर्वक इसका जप करना चाहिए ॥५२॥ इसको अभक्त, निःसन्तान तथा पाखण्डी को नहीं बतलाना चाहिए । सरसों के तेल में सूर्यावर्त के जल को मिलाकर नस्य के रूप में देना चाहिए ॥५३॥ हे पुत्र ! सूर्यावर्त सभी रोगों को विनष्ट कर देता है । संध्या के समय होमकर्म में मूलमंत्र का जप करना चाहिए ॥५४॥ मूलमंत्र का जप करने से रोग तथा क्रूरग्रह नष्ट हो जाते हैं । दूसरे अनेक मन्त्रों तथा शास्त्रों से क्या मतलव है ?॥५५॥ हे वत्स ! यह सभी प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली सर्व शान्तिप्रद है । इसको नास्तिकों तथा देवों एवं ब्राह्मणों के निन्दक को नहीं बतलाना चाहिए ॥५६॥ केवल गुरुभक्तों को बतलाना चाहिए दूसरों को कभी भी नहीं । जो प्रात:काल जगकर इसका पाठ करेगा ॥५७॥ चाहे वह गोध्न, कृतघ्न ही क्यों न हो सभी पातकों से मुक्त हो जायेगा । यह शरीर को निरोग बनाने वाला तथा धन और यश को बढाने वाला है ॥५८॥ जिसके ऊपर दिवाकर तुष्ट हों उसके ऐसा होने में कोई सन्देह नहीं है । जो प्रतिदिन _ एकवार-दो-बार या तीन बार सूर्य के सत्रिकट इस प्रसंग का पाठ करता है वह अपने अभीष्ट फल को प्राप्त करता है । इसका पाठ करने वाले पुत्रार्थी पुत्र को प्राप्त कर लेते हैं और कन्या चाहने वाले कन्या प्राप्त कर लेते हैं ॥५९-६०॥ विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है और धनार्थी धन प्राप्त करता है । इसका शुद्धाचरण पूर्वक श्रवण करना चाहिए ॥६१॥ ऐसा करने वाला सभी पापों से मुक्त होकर सूर्यलोक में जाता है । जो इसको सूर्य के ब्रत के समय, या यज्ञों के समय॥६२॥ या पवित्र तीर्थो में जाकर पाठ करता है, उसको करोड़ गुना फल प्राप्त होता है । ग्रहभोज्य के

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