Srishti Khanda Extracted Page 874
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-874
Sanskrit Original
सुवर्णरेता मित्रश्च पूषा त्वष्टा च ते दश। स्वयंभूस्तिमिराशश्व द्वादशः परिकीर्तितः ॥३५॥ नामान्येतानि सूर्यस्य शुचिर्यस्तु पठेन्नरः । सर्वपापाच्च रोगाच्च मुक्तो याति परां गतिम् ॥३६॥ पुनरन्यत््रवक्ष्यामि भास्करस्य महात्मनः । रक्ताख्या ये रक्तनिभास्सिदूरारुणविग्रहाः ॥३७॥ यनि नामानि मुख्यानि तच्छृणुष्व षडानन । तपनस्तापनश्चैव कर्त्ता हर्त्ता ग्रहेश्वर: ॥३८॥ लोकसाक्षी त्रिलोकेषु व्योमाधिपो दिवाकरः । अभ्निगर्भो महाविप्रः स्वर्गः सप्ताश्ववाहनः ॥३९॥ पद्महस्तस्तमोभेदी ऋग्वेदो यजुस्सामगः । कालप्रियं पुंडरीकं मूलस्थानं च भावितम् ॥४०॥ यःस्मरेच्च सदाभक्तद्या तस्य रोगभयं कुतः । शृणु कार्तिक यत्नेन सर्वपापहरं शुभम् ॥४१॥ नसंदेहो मनाक्कार्य आदित्यस्य महामते । ॐ इंद्राय नमः ३ॐ विष्णवे नमः॥४२॥ एषजप्यश्च होमश्च संध्योपासनमेव च । सर्वशांतिकरश्चैव सर्वविध्नविनाशनः ॥४३॥ नाशयेत् सर्वरोगांश्च लूताविस्फोटकादिकान्। कामलादिकरोगांश्च येरोगाश्चैवदारुणाः ।।४४॥ ऐकाहिकं ह्यहिकं च ज्वरं चातुर्थिकं तथा । कुष्ठं रोगं क्षयं रोगं कुक्षिरोगं ज्वरं तथा ॥४५॥ अश्मरी मूत्रकृच्छांश्च नानारोगामयांस्तथा । ये वातप्रभवा रोगा ये रोगा गर्भसंभवा: ॥४६॥ -मर्दयन्तो महारोगा मर्दिता वेदनात्मकाः । विलयं यांति ते सर्व आदित्योच्चारणेन तु॥४७॥ रक्ष मां देवदेवेश ग्रहरोगभयेषु च। प्रशमं यांति ते सर्वे कीर्तिते तु दिवाकरे ॥४८॥ मूलमंत्र प्रवक्ष्यामि सर्वकामार्थसाधकम्। भुक्तिमुक्तिप्रद नित्यं भास्करस्य महात्मनः ॥४९॥ चणचरात्मक जगत् के सभी शरीरों में विद्यमान हैं ॥३३॥ इस स्तोत्र का पाठ करके मनुष्य स्वर्ग तथा भोग्य पदार्थ आदि अपने मनोरथों को क्रमशः प्राप्त करता है । आदित्य, भास्कर, सूर्य, अर्क, भानु, दिवाकर ॥३४॥ सुवर्णरेता, मित्र, पूषा तथा त्वष्टा इन दश नामों को तया स्वयम्भू तथा तिग्मराशि ये द्वादश सूर्य के नाम हैं ॥३५॥ जो पवित्र होकर सूर्य के इन नामों को पढता है वह सभी पापों तथा सभी रोगों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेता है॥३६॥ फिर मैं भगवान् सूर्य के दूसरे आख्यान को बतला रहा हूँ । जो रक्त शब्द से कहे जाते है, रक्त के सदृश तथा सिन्दूर के सदृश शरीर वाले हैं ॥३७॥ इनके जो मुख्य नाम है, हे षडानन ! उन सबों को आप सुनें । तपन, तापन, कर्ता, हर्ता, ग्रहेश्वर ॥३८॥ तीनों लोकों में लोकसाक्षी, व्योमाधिप, दिवाकर, अग्निगर्भ, महाविप्र, स्वर्ग, सप्ताश्ववाहन।।३९॥ पद्महस्त, तमोभेदी, ऋग्युजुः साम स्वरूप, कालप्रिय, पुण्डरीक, मूलस्थान तथा भावित ॥४०॥ जो भक्तिपूर्वक इन नामों का स्मरण करे उसको रोग का भय नहीं हो । हे कार्तिकेय ! तुम सावधानी पूर्वक सुनो में सभी पापों को विनष्ट करके कल्याणकारी आख्यान बतलाता हूँ ॥४१॥ हे महामते ! आदित्य के विषय में थोड़ा सा भी सन्देह नहीं करना चाहिए । ३ॐ इन्द्राय नमः, ओ विष्णवे नम: ॥४२॥ ये ही मन्त्र तथा होम एवं सन्ध्योपासन हैं । ये ही समी प्रकार की शान्तियों को करने वाले तथा सभी विघ्नों को विनष्ट करने वाले हैं ॥४३॥ ये सभी रोगों, लूता, तथा घाव आदि को, कामलादिक रोगों तथा भयङ्कर रोगों को ॥४४॥ ऐकाहिक, त्रयाहिक तथा चातुर्थिक ज्वर को, कुष्ठ रोग, क्षयरोग, कुक्षिरोग, ज्वर ॥४५।। अशमरी (पथरी) तथा मूत्रकूछ आदि विविध आधिव्याधियों को विनष्ट करने वाले हैं। जो रोग वायु विकार से उत्पन्न होते हैं, जो रोग गर्भ से ही लग जाते हैं ॥४६॥ उन सभी महारोगों का मर्दन करते हुए ये सभी वेदनाओं को मर्दित करते हैं । ये सवके सब रोग आदित्य नाम का उच्चारण करने से विनष्ट हो जाते हैं॥४७॥ हे देवदेवेश महारोग जन्य भयों में आप मेरी रक्षा करें । इसतरह से दिवाकर नाम का कीर्तन करने पर सभी रोग विनष्ट हो जाते हैं ॥४८॥ में भगवान् सूर्य के भोग तथा मोक्ष को प्रदान करने वाले तथा सभी कामनाओं एवं अथों १०७
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