Srishti Khanda Extracted Page 873
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-873
Sanskrit Original
FSS OS £ आंत का काक DN ८४८ श्रीपद्ममहापुराण नास्माकं बंधमोक्षौ च नाकार्यं कार्यमेव वा । तथालोकस्य रक्षार्थ॑ चरामो विधिपूर्वकम् ॥२१॥ सर्वं च परमं चैव सर्वविध्नविनाशनम् । सर्वरोगप्रशमनं सर्वार्थप्रतिसाधकम्॥२२॥ एकोसौ बहुधा भूत्वा कालभेदादर्निदितः । मासे मासे तु तपति एकोद्वादशतां ब्रजेत् ॥२३॥ मित्रो मार्गशिरे मासि पौषे विष्णुः सनातनः । वरुणो माघमासे तु सूर्यो वै फाल्गुने तथा ॥२४॥ चैत्रे मासि तपेद्धानुर्वैशाखे तापनः स्मृतः । ज्येष्ठमासे तपेदिंद्र आषाढे तपते रविः ॥२५॥ | गभस्तिः श्रावणे मासि यमो भाद्रपदे तथा। हिरण्यरेताश्वयुजि कार्तिके तु दिवाकरः ॥२६॥ इत्येते द्वादशादित्या मासि मासि प्रकीर्तिताः । उरुरूपा महातेजा युगांतानलवर्चसः॥ २७॥ य इदं पठते नित्यं तस्य पापं न विद्यते । न रोगो न च दारिद्य नावमानो भवेत्क्वचित् ॥२८॥ अक्षयं लभते स्वर्ग सुखं राज्यं यशः क्रमात्। महामंत्रं प्रवक्ष्यामि सर्वप्रीतिकरं परम् ॥२९॥ ॐ नमः सहस्रबाहवे आदित्याय नमो नम: । नमस्ते पद्महस्ताय वरुणाय नमो नमः ॥३०॥ | नमस्तिमिरनाशाय श्रीसूर्याय नमो नमः । नमः सहस्रजिह्णाय भानवे च नमो नमः ॥३१॥ त्वं च ब्रह्मात्वं च विष्णूरुद्रस्त्वं च नमो नमः। त्वमग्निः सर्वभूतेषु वायुस्त्वं नमो नमः॥३२॥ सर्वगः सर्वभूतेषु नहि किंचित्त्वया विना । चराचरे जगत्यस्मिन्सर्वदेहे व्यव्वस्थिताः ॥३३॥ इति जप्त्वा लभेत्कामं स्वर्ग भोग्यादिकं क्रमात् । आदित्यो भास्करः सूर्यो अर्को भानुर्दिवाकरः॥३४॥ सर्वज्ञ, वर देने वाले तथा सभी प्राणियों के स्वामी हैं । हे नाथ ! आपको इस प्रकार क्रोध और उसके कारण होने वाले पाप का कारण क्या है 2॥१९॥ शिवजी ने कहा-- हे पुत्र ! ब्रह्मा, विष्णु और में ये तीनों संसार का कल्याण करने के लिए प्रत्येक युग में सब कुछ करते रहते हैं ॥२०॥ हमलोगों को न तो बन्धन होता है और न मोक्ष होता है । हमलोगों के लिए कुछ भी कर्तव्य आथवा अकर्तव्य नहीं है । हमलोग संसार की रक्षा करने के लिए विधिपूर्वक कार्यो को करते रहते हैं ॥२१॥ ये सूर्य सबसे श्रेष्ठ, सभी विघ्नों का विनाश करने वाले तथा सभी रोगों को शान्त करने वाले समी कार्यो को सिद्ध करते रहते हैं । ये यद्यपि एक हैं, किन्तु भिन्न-भिन्न कालों में भिन्न-भिन्न होकर बारह प्रकार के होते है और प्रत्येक मास में भिन्न रूप से संतप्त होते रहते हैं ॥२३॥ ये मार्गशिर (अग्रहायण) मास में मित्र रूप से, पौष मास में सनातन विष्णु रूप से, माघमास में वरुण रूप से, फाल्गुन मास में सूर्य रूप से॥२४॥ चेत्रमास में भानु रूप से, वैशाखमास में तापन रूप से, ज्येष्ठ मास में इन्द्र रूप से तथा आषाढ में रवि रूप से सन्तप्त होते हैं ॥२५॥ श्रावण मास में गभस्ति रूप से, भाद्रपद मास में यम रूप से, आश्विन मास में हिरण्यरेता रूप से, और कार्तिक मास में ये दिवाकर रूप से तपते हैं ॥२६॥ ये प्रत्येक मास के अलग-अलग द्वादश आदित्य है । इनके अनेक रूप हैं महातेजस्वी हैं तथा प्रलयाग्नि के समान इनकी कान्ति है ॥२७॥ जो व्यक्ति इस प्रसंग को पढता है उसके पापों का नाश हो जाता है । उस व्यक्ति को न तो कोई रोग होता है, न कोई दरिद्रता होती है और न तो कहीं उसका कोई अपमान हो पाता है ॥२८॥ वह अक्षय स्वर्ग, सुख तथा राज्य का भोग करता है ।मै सूर्य के महामन्त्र को बतलाता हूँ जिससे भगवान् सूर्य को अत्यन्त प्रसन्नता होती है ॥२९॥ हजारो बाहुओं वाले आदित्य को बारम्बार नमस्कार है । हाथ में कमल धारण करने वाले वरुण को नमस्कार है ॥३०॥ अन्धकार को नष्ट करने वाले श्रीसूर्य को नमस्कार है । हजारों जिह्वाओं वाले भानु को नमस्कार है । ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र स्वरूप आप को बारम्बार नमस्कार है । सभी भूतों (जीवों) के भीतर आप अग्नि तथा वायु रूप से विद्यमान हैं ॥३१-३२॥ आप सर्वत्र जाने वाले तथा सभी भूतों में रहने वाले हैं संसार में आप से रहित कुछ भी नहीं है । आप सम्पूर्ण
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