Srishti Khanda Extracted Page 872
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-872
Sanskrit Original
सर्वकामप्रदं पुण्यमैश्वच्य॑ रोगनाशनम् । स्वर्गदं मोक्षदं पुण्यं रवेवरि व्रतं हितम् ॥७॥ रविवारेण संक्रांत्या सप्तम्या तददिने शिवे । व्रतपूजादिकं चाप्यं सर्व चाक्षयतां ब्रजेत्॥८॥ आदित्यवासरे शुभ्रे ग्रहाधिपप्रपूजनम्। प्राणादहतवक्त्रेण निःसार्य मंडले न्यसेत् ॥९॥ द्विभुजं रक्तपद़स्थं सुगलं रक्तवाससम् । सर्वरक्ताभरणं ध्यात्वा हस्ताभ्यां पुष्पं विधृतसंप्रायैशान्यां क्षिपेत् ॥९०॥ आदित्याय विद्यहे भास्कराय धीमहि । तन्नो ' भानुः प्रचोदयात्॥९ ९॥ ततो गुरूपदिष्टेन विधिना च विलेपनम् । विलेपनांते सद्धपं धूपांते च प्रदीपकम्॥१२॥ प्रदीपांते च नैवेद्यं ततो वारि निवेदयेत्। ततो जप्यं स्तुतिं मुद्रां नमस्कारं तु कारयेत्॥९३॥ अंजलिः प्रथमा मुद्रा द्वितीया धेनुका स्मृता । एवं यः पूजयेदर्कं रविसायुज्यमाव्रजेत् ॥१४॥ मम ब्रह्मवधं वोरं कपालं करलम्नरकम् । रवेस्तस्यप्रसादात्तु मुक्तं वाराणसीतटे ॥१५॥ रवेः परतरं दैवं त्रैलोक्ये तु नविद्यते । यस्य प्रसादतो घोरान्मुक्तोहं गुरुकिल्बिपात् ॥१६॥ स्कंद उवाच श्रुत्वा त्वत्तो गिरं नाथ विस्मयो मेऽ भवत्प्रभो। त्वदन्योस्ति न को देवः कथं ब्रह्मवधं त्वयि ॥१७॥ त्वं च ज्ञानीश्वरो योगी लोके भोक्ताऽ क्षरोव्ययः । देवानां गुरुरेकस्त्वं व्याप्तरूपी महेश्वरः ॥१८॥ सर्वज्ञो वरदो नित्यं सर्वेषां प्राणिनां प्रभुः । दुष्कृतं ते कुतो नाथ तथा क्रोधोविशेषतः॥१९॥ शिव उवाच लोकानां चहितार्थाय पृथग्भूता युगे युगे । सर्वं कुर्मो वयं पुत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥२०॥ उससे सम्पूर्ण ऐश्वर्या की प्राप्ति कराने वाला तथा रोगों को विनष्ट करने वाला पुण्य होता है । रविवार का व्रत स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले पुण्य का जनक होता है ॥७॥ यदि रविवार के दिन सप्तमी तथा संक्रान्ती दोनों का योग हो तो उस दिन को किया गया व्रत तथा पूजा सब कुछ अक्षय होता है ॥८॥ उस दिन सूर्य की पूजा करनी चाहिए। मुख से सटाये बिना सूर्य को प्राणों से निकालकर सूर्य मण्डल में विन्यस्त करे ॥९॥ फिर दो भुजाओं वाले लाल कमल पर बैठे सुन्दर गला वाले, रक्त वस्र धारण किए हुए तथा समस्त लाल आभरणों से भूषित भगवान् सूर्य का ध्यान हाथ में लाल पुष्प लेकर करे उसके बाद उस फूल को सूंघकर ईशान कोण में फेंक दे |।१०।। इसके बाद आदित्याय विद्महे भास्कराय धीमहि तन्नो भानुः प्रचोदयात् । इस सूर्य गायत्री मन्त्र का जप करे ॥११॥ उसके बाद आचायॉपदिष्ट विधि से भगवान् सूर्य को चन्दन लगाये । उसके बाद धूप उसके बाद दीप निवेदित करे।॥१२॥ प्रदीप के बाद नैवेद्य तथा उसके बाद जल निवेदित करे । उसके बाद सूर्य गायत्री का जप करके स्तुति करे और मुद्रा प्रदर्शित करे । अन्त में नमस्कार करे ॥१३॥ सूर्य की पहली अंजलि मुद्रा है, दूसरी सुरभिमुद्रा है । इस प्रकार से सूर्य की पूजा करने वाला मनुष्य भगवान सूर्य के सायुज्य को प्राप्त करता है ॥१४॥ मुझे ब्रह्माजी का शिर काटने से ब्रह्महत्या के कारण उनका शिर मेरे हाथ से सट गया था, भगवान् सूर्य की ही कृपा से वाराणसी में जाकर वह कपाल मेरे हाथ से छूटा ॥१५॥ त्रैलोक्य में सूर्य से बड़ा कोई देवता नहीं हैं, उन्हीं की कृपा से मैं भयङ्कर पाप से मुक्त हुआ था ॥१६॥ स्कन्दजी ने कहा-- हे नाथ ! आपकी वाणी को सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है । आप से बढकर कौन देवता है जिसके कारण आपको ब्रह्महत्या लगी ॥१७॥ आप ज्ञानियों में श्रेष्ठ, योगी, लोक में एकमात्र अक्षर तथा अव्यय भोक्ता हैं । देवताओं के आप प्रधान स्वामी है, व्याप्त तथा रूपी महेश्वर हैं ॥१८। आप
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