Srishti Khanda Extracted Page 871
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-871
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण यः कुर्यात्पारणं भक्त्या सूर्यलोकं स गच्छति । कल्पकोटिं वसेत्स्वर्गे ततो याति परां गतिम्॥१०४॥ इदमेव परं गुह्यं भाषितं शंभुना पुरा । श्रवणात्सततं तस्य व्रतस्य परिपालनात् ॥ श्रावयेद्वापि लोकस्य फलं तुल्यं प्रकीर्तितम् ॥१०५॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे अर्काङ्गसप्तमीव्रतं नाम सप्तसप्ततिमोऽध्यायः ॥७७॥ ke अठहत्तरवों अध्याय वैशंपायन उवाच भगवस्त्वत्प्रसादाच्च श्रुतं मे पावनं ब्रतम् । अपरं श्रोतुमिच्छामि ब्रध्नस्य च प्रियं च यत् ॥१॥ व्यास उवाच कैलासशिखरे रम्ये सुखासीनं महेश्वरम् । प्रणम्य शिरसा भूमौ स्कंदो वचनमब्रवीत् ॥२॥ अर्काङ्गाख्याविधिस्त्वत्तो मयैवं विस्तराच्छुतः । वारादेर्यत्ूफलं नाथ श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥३॥ ईश्वर उवाच रक्तपुष्पैरवेवरि त्वर्ध्यंदद्याद्ब्रती नरः । नक्ताहारं हविष्यान्नं कृत्वा स्वर्गान्न हीयते ॥४॥ सप्तम्याश्च सदाचारं सर्वेवार्कवासरे । कुर्वतः प्रीतिमाप्रोति सगणः परमेश्वरः ॥५॥ सूरस्य सदृशं याति तिथिवारस्य पालनात्। एकेन गाणपत्यस्य यावत्सूरो नभस्तले ॥६॥ पारण करता है वह सूर्य लोक में जाकर पूजित होता है । वह करोड़ कल्पों तके सूर्य लोक में रहने के बाद मुक्त हो जाता है ॥१०३-१०४॥ इस अत्यन्त गोपनीय व्रत को शङ्करजी ने बतलाया है इस प्रसङ्ग को सुनने तथा सदा ब्रत का पालन करने से अथवा किसी को सुनाने से एक बराबर फल होता है ॥१०५॥ इस तरह श्रीपद्मपुराण के सृष्टिखण्ड के अर्काङ्गसप्तमी नामक व्रत का वर्णन नामक सतहत्तरवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ७७।। ie सूर्य के अनेक ब्रतों का वर्णन, सूर्य शान्ति का विधान वर्णन वैशम्पायन महर्षि ने कहा-- भगवन् ! आपकी कृपा से मैंने पवित्र ब्रत का श्रवण किया । अब में दूसरी बातें जो भगवान् सूर्य को प्रिय हैं, उन्हें सुनना चाहता हूं ॥१॥ व्यासजी ने कहा-- एकबार महेश्वर कैलास पर्वत पर सुख पूर्वक बैठे थे उसी समय स्कन्दजी ने भूमि पर शिर टेककर उनसे पूछा-- मैने अर्काङ्ग सप्तमी ब्रत की विधि को आपसे विस्तार पूर्वक सुना है । हे नाथ ! दिनों आदि के जो फल होते हैं उन सबों को मैं आपसे सुनना चाहता हूँ ॥३॥ ईश्वर ने कहा-- ब्रती मनुष्य को रविवार को लाल पुष्प से सूर्याध्य देना चाहिए ।नक्त की वेला में हविष्यात्र का भोजन करने वाला ब्रती कभी स्वर्ग से भ्रष्ट नहीं होता है ॥४॥ सप्तमी तिथि के रविवार को सभी सदाचारों का पालन करने वाले मनुष्य भगवान् विष्णु अपने गुणों के साथ प्रसन्न होते हें ॥५।। तिथि और वार के व्रत का पालन करेने मात्र से ही मनुष्य तब तक गाणपत्य को प्राप्त किए रहता है जब तक सूर्य आकाश में रहते हैं ॥६॥
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