Srishti Khanda Extracted Page 870

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-870

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Sanskrit Original

घृतमपि तत्परिमाणम् ॥९९॥ आत्मनो द्विगुणां छायां यदाकुर्वीतभास्कर: । तदानक्तं विजानीयान्ननक्तंनिशिभोजनम् ॥९२॥ प्रथमं पूजयेद्देवं फलंपुष्पादिमंत्रकैः । अन्नदानं ततः कुर्याद्विध्युक्तपरिमाणकम् ॥९३॥ ततो ध्यानम् सर्वलक्षणसंपूर्ण सर्वाभरणभूषितम् । द्विभुजं रक्तवर्ण च रक्तपंकजधृत्करम्॥९४॥ तेजोबिबं बहुजलमध्यस्थं सपरिच्छदम्। पद्मासनगतं देवं रक्तगंधानुलेपनम्॥९ ५॥ आदित्यं च्ितयेद्देवं पूजाकाले विशेषतः । अथ मंत्रश्चायं भास्कराय विद्महे सहस्ररश्मये धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥९६॥ जप्य एष परः प्रोक्तः सप्तम्यां विजयावहः । करवीरैः करजैश्च रक्तकुंकुमसन्निभैः ॥९७॥ पश्चाच्च पारणा कार्या तथाष्टम्यां विशेषतः । अष्टम्यामेव कर्तव्यं नवम्यां नैव पारणम् ॥९८॥ ब्रते फलं न चाप्नोति नवम्यां पारणे कृते । पारणं त्वपराह्ले तु कटुतिक्ताम्लवर्जितम् ॥९९॥ तंडुलं शोधयेद्यत्नात्तणबीजादिकं त्यजेत् । मुद्रमाषतिलादीनि घृतं चपरिवर्जयेत्॥९००॥ ब्राह्मणान्भोजयेद्धक्तया शक्तः क्षीरादिहव्यकैः । यथाशक्त्न्नपानैश्च व्यंजनैश्च निरामिषैः ॥९०९॥ विप्राय दक्षिणां दद्याद्विभज्य चानुरूपतः। इमामनंतफलदां यः कुर्यात्सप्तमीं नरः ॥१०२॥ सर्वपापप्रशमनीं धनपुत्रविवर्थनीम्। मासि मासि द्विजश्रेष्ठ व्रतं कृत्वार्कतुष्टये ॥१ ० ३॥ चाहिए । खजूर अथवा नारियल इन दोनों में कोई हो वही फल है । उसको दाँतों से स्पर्श किए बिना जल से पीना चाहिए । मयूर के अण्डे के परिमाण वाले आहार को उतने ही परिमाण में घी से मिलाकर खाये । इसे ही घृताक्त आहार कहते हैं ॥९०-९१॥ जब सूर्य अपने दो गुना छाया करें उसी समय को नक्त कहते हैं । नक्त रात्रि में भोजन करने को नहीं कहते हें ॥९२॥ पहले फल तथा पुष्प आदि से सूर्य की पूजा मन्त्र द्वारा करे । उसके वाद विधिपूर्वक बतलाये गये परिमाण में अन्न दान करे ॥९३॥ उसके बाद ध्यान करे सभी शुभ लक्षणों से परिपूर्ण, सभी आमूषणों से भूषित दो मुजाओं वाले, रक्त वर्ण वाले हाथ में रक्त कमल धारण किए हुए ॥९४॥ तेजो मण्डल स्वरूप, बहुत अधिक जल में स्थित परिच्छदों से युक्त, कमल के आसन पर बैठे हुए, रक्त चन्दन के अङ्गरागों से संलिप्त ॥९५॥ ऐसे आदित्य का विशेष रूप से पूजा के समय ध्यान करना चाहिए । सूर्य की पूजा का मन्त्र यह है- भास्कराय विद्याहे सहस्ररश्मये धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् । विजय प्राप्त करने के लिए सप्तमी तिथि को यह विशेष रूप से जपने योग्य मन्त्र कहा गया है । सूर्य की कुंकुम के सदृश करवीर तथा करञ्ज पुष्पों से पूजा करे ॥९७॥ उसके बाद विशेष रूप से अष्टमी में ही पारण करना चाहिए । नवमी मे नहीं ॥९८॥ नवमी में पारण करने से ब्रत का फल नहीं होता है । पारण अपराहण में, कटुतिक्त, खट्टा से रहित अन्न से होना चाहिए ॥९९॥ चावल को पहले बीन ले उसमें से तृण तथा बीज आदि को निकाल दे । उसमें से मूंग, ऊड़द तिल आदि को निकालकर घी भी न डाले॥ १० ०॥ पहले ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक भोजन कराये, शक्ति हो तो दुग्ध इत्यादि से बने पदार्थ तथा मांस रहित व्यञ्जन इत्यादि ब्राह्मणों को भोजन कराये । ब्राह्मणों को उनके स्वरूपानुरूप अलग-अलग दक्षिणा देनी चाहिए । इस अनन्त फल को प्रदान करने वाली सप्तमी को जो मनुष्य करता है ॥१०१-१०२॥ इस सभी पापों को विनष्ट करने वाली, धन धान्य को बढाने वाली सप्तमी का प्रत्येक मास में सूर्य की प्रसन्नता के लिए ब्रत करके जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक

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