Srishti Khanda Extracted Page 869
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-869
Sanskrit Original
रक्तवस्त्रं च धान्यं च शक्तितो य: प्रयच्छति । स्वगर्व्योरीशतामेति नतं लक्ष्मीर्विमुंचति ॥८२॥ अरोगी सुप्रसन्नात्मा दस्युजेता प्रतापवान् । यावत्प्रभासते भानुस्तावत्पूज्यतमो हि सः ॥८३॥ माघादौ द्वादशीं मायां सप्तमीं कारयेत्स तु । इहाभीष्टफलंभुक्त्वा सुरैश्चैव प्रपूज्यते ॥८४॥ अर्काङ्गसप्तमीव्रतं कृत्वा च विधिवद्वधः । पापात्पूत इहाभीष्टं संप्राप्य मुक्तिमाघ्रुयात्॥८५॥ लक्षणं च प्रवक्ष्यामि मासि मासि च यो विधिः । व्रतस्यास्य प्रसादाच्च सुराणामर्चितो द्विवि॥८६॥ शुक्लपक्षे रविदिने प्रवृत्ते चोत्तरायणे। पुंनामधेयन क्षत्र गृह्णीयात्सप्तमीव्रतम् ॥८ ७॥ हस्तो मैत्रं तथा पुष्यः श्रवो मृगपुनर्वसु । पुंनामधेयनक्षत्राण्येतान्याहुर्मनीषिणः ॥८ ८॥ पंचम्यामेकभक्तं तु पष्ठ्यां नक्तं प्रकीर्तितम्। सप्तम्यामुपवासं च अष्टम्यां पारणं भवेत् ॥८९॥ अर्काग्रं शुचिगोमयं सुमरिचं तोयं फलं चाश्नुते मूलं नक्तमुपोषणं चविधिवत्कृत्वैक भक्तं तथा । क्षीरं वाप्यशनं घृताक्तमिति च प्रोक्ताः क्रमेणामुना कृत्वावासरसप्पीदिनकृतेः प्राप्रोत्यभीष्टं फलम् ॥९ ०॥ अकाग्रं ग्रामात्पूर्वोत्तरदिग्गर्तार्कविटपस्य शाखाग्रस्थितं विशिष्टं सूक्ष्मपत्रद्वयं सतोयं दन्तैरस्पृष्टपातव्यम् । शुचिगोमयं भूमावपतितं मध्यमाङ्गष्टाभ्यां पलमात्रं दन्तैरस्पृष्टं सतोयं पातव्यम् ॥ सुमरिचमव्रणमपुरातनं स्थूलमवशुष्कमेकं दन्तैरस्पृष्टं सतोयं पातव्यम् । तोयं ब्रह्मापित्रङ्गलीमूलप्रसरं पातव्यम् ॥ फलं खर्जुरनारिकेलानामन्यतमं दंतैरपृष्टं पातव्यम्घृताक्तमितिचाहारं मयूरडिंभपरिमाणम् ॥ करता है वह स्वर्ग के धन का स्वामी होता है ॥८०-८१॥ जो अपनी शक्ति के अनुसार लाल वस्त्र तथा अन्न दान करता है, वह स्वर्ग तथा पृथिवी का स्वामी होता है । लक्ष्मी उसका कभी भी त्याग नहीं करती है ॥८२॥ जहाँ तक सूर्य प्रकाशित होते हैं वहाँ तक का रोगरहित, हमेशा प्रसन्न रहने वाला, दस्युओं को जीतने वाला तथा प्रतापी स्वामी होता है ॥८३॥ माघ आदि महीनों में द्वादशी, आमावस्या तथा सप्तमी का ब्रत करना चाहिए । ऐसा करने वाला इस लोक में अपने अभीष्ट फलों का भोग करके स्वर्ग में देवताओं द्वारा पूजित होता है ॥८४॥ विज्ञ पुरुष अर्काङ्ग सप्तमी ब्रत को विधिपूर्वक करके पापों से रहित हो जाता है, इस लोक में अभीष्ट फल प्राप्त करके मुक्ति प्राप्त कर लेता है।।८ ५॥ प्रत्येक मास में जो विधि होती है, उसे मैं बतलाता हूँ । इस ब्रत के प्रभाव से व्रती देवताओं द्वारा पूजित होता है ॥८६॥ यदि शुक्ल पक्ष में रविवार के दिन उत्तरायण प्रारम्भ हो तो पुल्लिंग नाम वाले नक्षत्रों में ब्रत प्रारम्भ करना चाहिए ॥८७॥ हस्त नक्षत्र मित्र देवताक मघा नक्षत्र, पुष्य नक्षत्र, श्रवण नक्षत्र, मृगशिर नक्षत्र, पुनर्वसु ये सभी नक्षत्र पुल्लिङ्ग नाम वाले हैं यह मनीषियों ने कहा है ॥८८॥ पञ्चमी तिथि को एक शाम भोजन करे । षष्ठी को रात्रि में मोजन करे सप्तमी को उपवास करे और अष्टमी को पारण करे ॥८९॥ आक का अग्रभाग, पवित्र गोबर, मरिच, जल, फल और मूल को खाकर तथा नक्त की बेला में उपवास करके, तथा एक शाम भोजन करके अथवा घृत मिश्रित दुग्ध का भोजन करके ये सभी ब्रताङ्ग बतलाये गये हैं । इन सबों से अर्काङ्ग सप्तमी का ब्रत करने वाला मनुष्य अपने अभीष्ट फलको प्राप्त करता है । अर्काग्र को ग्राम के ईशान कोण में उत्पन्न अर्क के वृक्ष की शाखा के अग्र भाग में विद्यमान विशिष्ट दो पत्तों को जल के साथ दाँत से स्पर्श किए बिना पीना चाहिए । ब्रह्म तथा पितरों की जो अङ्गुलि का मूल उससे गिरे हुए जल को पीना चाहिए । जो पृथिवी पर न गिरा हो ऐसे गोबर को मध्यमा तथा अङ्गुठे से पल (माशे) भर उठाकर जिसका दाँतों से स्पर्श हो ऐसे जल से पीना चाहिए । उसे ही शुचि गोमय कहते हैं। ब्रण रहित, नवीन, बड़ा सा, सुखा हुआ एक मरिच को सुमरिच कहते हैं । उसे दाँतों से स्पर्श किए बिना जल से पीना
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