Srishti Khanda Extracted Page 867

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-867

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Sanskrit Original

पितृंतिलजलैरेव तर्पयित्वा क्षयो दिवि । सुलक्षणां च गां दत्वा हेमश्रृंगां मणिप्रभाम् ॥५२॥ रौप्यखुरप्रदेशां च तथा कांस्यसुदोहनाम् । एतां दत्वा द्विजाग्र्याय सार्वभौमो भवेन्नप: ॥५३॥ दत्वान्नाभरणं राजा मंडले शोधनेश्वरः । तिलधेनुं तु यो दद्यात्सर्वोपस्करणान्विताम् ॥५४॥ सप्तजन्मर्जितात्पापान्मुक्तो नाकेऽ क्षयो भवेत् । भोज्यान्नं ब्राह्मणे दत्वा अक्षयं स्वर्गमश्नुते ॥५५॥ धान्यं वस्त्रं तथा भृत्यं गृहपीठादिकं च यत् । यो ददाति द्विजाग्र्याय तं च लक्ष्मीर्न मुंचति ॥५६॥ यत्किचिह्रीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु । अक्षयं परलोकेषु युगाद्यासु तथैव च॥५७॥ यद्दा देवार्चनं स्तोत्रधर्माख्यानप्रतिश्रवः। पुनाति सर्वपापेभ्यो दिवि पूज्यो भवत्यसौ॥५८॥ तृतीया माधमासस्य सिता मन्वंतरा स्मृता । तस्यां यद्दीयते दानं सर्वमक्षयमुच्यते॥५९॥ धनं भोग्यं तथाराज्यं नाकं कल्पांतरस्थितम् । तस्माद्दानं सतां पूजा प्रेत्यानंतफलप्रदा ॥६ ०॥ मन्वंतरा तु माघे स्यात्सप्तमी या सितेतरा। तिथिः पुण्यतमा प्रोक्ता पुराणैरभिरक्षिता ॥६१॥ माघमासे सिते पक्षे सप्तमी कोटिभास्करा । तामुपोष्य नरः पुण्यां मुच्यते नात्र संशयः ॥६२॥ सूर्यग्रहणतुल्या हि शुक्ला माघस्य सप्तमी । अरुणोदयवेलायां तस्यां स्नानं महाफलम् ॥६३॥ यच्च तत्र कृतं पापं मया सप्तसु जन्मसु । तन्मे रोगं च शोकं च भास्करी हंतु सप्तमी॥६ ४॥ जननीसर्वभूतानां सप्तमी सप्तसप्तिके । सप्तम्यामुदिते देवि नमस्ते रविमंडले ॥६५॥ अर्कपत्रं यवाः पुष्पं सुगंधं बदरीफलम् । तत्पत्रे ताप्रपात्रेवा युक्तमानीयतण्डुलम् ॥६६॥ है । माघ के महीने के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को प्रातःकाल ॥५१॥ पितरों का तिल से तर्पण करने वाले को अक्षय स्वर्ग प्राप्त होता है । सुन्दर लक्षणों वाली गौ के सीग को सुवर्ण से तथा खुर को चाँदी से ढँककर काँसे के दोहन पात्र के साथ किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान देने वाला सार्वभौम राजा होता है ॥५२-५३॥। अन्न एवं अलङ्कार का दान करने वाला राजा, मण्डलेश्वर तथा धनीश्वर होता है । जो उस दिन सभी उपकरणों के साथ तिलधेनु का दान करता है ॥५४॥ वह सात जन्मों में किए गये पापों से मुक्त होकर अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥५५॥ अन्न, वस्र, भृत्य तथा गृह एवं चौकी आदि का ब्राह्मण को दान करने वाले का लक्ष्मी कभी त्याग नहीं करती है ॥५६॥ युगादि तिथियों में जो कुछ भी थोड़ा अथवा बहुत दान किया जाता है वह परलोक में अक्षय होता है ॥५७॥ जो कुछ भी देवार्चन, स्तोत्र पाठ तथा धर्मकथा का श्रवण किया जाता है, वह उसको पवित्र बना देता है तथा वह स्वर्ग में पूज्य होता है ॥५८॥ माघ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि ही मन्वन्तर तिथि कही जाती है उस तिथि को जो दान दिया जाता है वह स्वर्ग में अक्षय होता है ॥५९॥ धन, भोग्य पदार्थ, राज्य, स्वर्ग ये सब उसको कल्पान्तर पर्यन्त बने रहते हैं । इसीलिए दान, सज्जनों की पूजा ये सब मरने के पश्चात् फलप्रद बतलाये गये हैं ।।६०।। माघ मास की जो सप्तमी तिथि होती है वह अत्यधिक पुण्यवती बतलायी गयी है तथा वह पुराणों में सुरक्षित है ॥६१॥ माघ मास के शुक्लपक्ष में होने वाली कोटि भास्कर तिथि के समान है, उस तिथि को उपवास करने वाला मनुष्य नि:सन्देह मुक्त हो जाता है॥६२॥ माघ के शुक्लपक्ष की सप्तमी, सूर्य ग्रहण के समान बतलायी गयी है । उस तिथि को अरुणोदय की बेला में स्नान महान् फल देने वाला बतलाया गया है ॥६३॥ स्नान करते समय यच्च तत्र इत्यादि श्लोक पढे। उसका अर्थ है मैने सात जन्मों में जो पाप किया है उन पापों को, रोगों को, शोकों को, भास्करी सप्तमी विनष्ट कर दे॥६४॥ हे देवि ! आप सभी जीवों की माता है । सप्तमी में रवि मण्डल के उदित हो जाने पर आक का पत्ता, यव, सुगन्धित पुष्प बदरीफल, उस पत्ते पर अथवा ताम्बे के पात्र में रखकर चावल के साथ, यज्ञोपवीत तथा सिन्दूर

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