Srishti Khanda Extracted Page 866
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-866
Sanskrit Original
चिच्छेद च रवेर्भानून् प्रलयानलसन्निभान् । तैरेव रचितं तत्र विष्णोश्वकं सुदर्शनम् ॥३७॥ अमोधं यमदंडं च शूलं पशुपतेस्तथा । कालस्य च परः खड्गश्शक्तिर्गुरुप्रमोदिनी ॥३८॥ चंडिकायाः परं शस्त्रं विचित्र शूलकं तथा । चक्रे ब्रह्माज्ञयाशीघ्रं तेनैव विश्वकर्मणा॥३९॥ सहस्रकिरणं शिष्टमन्यच्चैव प्रशातितम् । अजनोपायभावेन पुनश्च कश्यपान्मुने॥४०॥ अदितेर्गभसंजात आदित्य इति वैस्मृतः। अयं चरति विद्वांते मेरुशृगं भ्रमत्यपि ॥४९॥ सदोर्ध्व॑दिनरात्रं च धरण्या लक्षयोजने । ग्रहा श्रंद्रादयस्तत्र चरंति विधिनोदिताः ॥४२॥ सूरः संचरते मासानृद्वादशद्वादशात्मकः । संक्रमादस्य संक्रांति: सर्वैरैव प्रतीयते ॥४३॥ तासु यद्वा फलं ब्रूमो लोकानां निखिलं मुने । धनुर्मिथुनमीनेषु कन्यायां षडशीतयः ॥४४॥ वृषवृश्चिककुंभेषु सिंहो विष्णुपदीस्मृता ।तर्पणं चाक्षयं विद्धि दानं देवार्चनं तथा ॥४५॥ षडशीतिसहस्राणि षडशीतौ फलं भवेत् । विष्णुपद्यां तु लक्षं तु अयनेकोटिकोटिकम् ॥४६॥ विष्णुपद्यां तु यद्दानमक्षयं परिकीर्तितम् । दातुर्वदामि सान्निध्यं सदा जन्मनि जन्मनि॥४७॥ शीते तूलपटीदानान्नदुःखं जायते तनौ । तुलादाने तल्पदाने द्वयोरेवाक्षयंफलम् ॥४८॥ सर्वोपकरणां शय्यां यो ददाति विमत्सरः । वर्णमुख्याय विप्राय सराजपदवीं लभेत् ॥४९॥ तथैवाम्रिं जलं दत्वा नदीतीरे पथिप्रगे । दत्वा च तैलतांबूलमूर्व्या अधिपतिर्भवेत् ॥५ ०॥ सत्यभावाद्द्विजं नत्वा धनी चाक्षयतांब्रजेत् । माधे मास्यसिते पक्षे पंचदश्यामहर्मुखे ॥५ १॥ भगवान् विष्णु के चक्र को बनाया गया ॥३७॥ अमोघ यमदण्ड तथा शङ्कर का त्रिशूल वना । उसी से काल का श्रेष्ठ खड्ग तथा चण्डिका का परं शस्त्र अत्यन्त भारी प्रमोदिनी नामक शक्ति तथा अद्भुत त्रिशूल बना । इन सबों को विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी की आज्ञा से बनाया ॥३७-३८॥ अव सूर्य में केवल एक सहस्त्र किरणें अवशिष्ट रहीं। अन्य सभी किरणें छाँट दी गयीं । ये सभी चीजे ब्रह्माजी के कहने से ही वनीं कश्यप महर्षि की पत्नी अदिति के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण सूर्य को आदित्य कहते हैं । सूर्य विश्व की अन्तिम सीमा तक सञ्चरण करते है और सुमेरु के शिखर पर भी श्रमण करते हैं ॥४०-४१॥ ये दिन-रात सदैव पृथिवी से लाख योजन ऊपर भ्रमण करते हैं । वहीं पर ब्रह्माजी से प्रेरित होकर चन्द्रमा आदि भी भ्रमण करते रहते हैं ॥४२॥ सूर्य बारह महीनों में बारह रूप धारण करके बारह राशियों में संक्रमण करते है । उस संक्रमण को ही संक्रान्ति कहते हैं, यह सब लोग जानते हैं । उन राशियों में दानादि का जो फल होता है उसे मैं बतलाता हूँ । धनु, मिथुन, कन्या तथा मीन की संक्रान्तियो को षडशीति कहते हैं ॥४२-४४॥ वृष, वृश्चिक, कुम्भ तथा सिंह की संक्रान्तियों को विष्णुपदी कहते हैं । इन दोनों में किये गये तर्पण देवार्चन तथा दान अक्षय होते हैं ॥४५॥ षडशीति संक्रान्तियो में किए गये दान का फल छियासी हजार गुना होता है । विष्णुपदी की संक्रान्तियों में किये गये दानादि लाख गुना होते हैं । दोनों अयनों के आरम्भ में किए गये दानादि का फल करोड़-करोड़ गुणा होता है ॥४६॥ विष्णुपदी में जो दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है । दानदाता के प्रत्येक जन्म में उस फल का सान्निध्य बना रहता है ॥४७॥ जाड़े में रजाई दान करने से दाता के शरीर में दुःख नहीं होता है । तुलादान तथा शय्यादान दोनों का अक्षय फल होता है ॥४८॥ जो व्यक्ति विना किसी मत्सर के सभी उपकरणों से युक्त शय्या अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाले ब्राह्मण को दान देता है वह राजा होता है ॥४९॥ उसी तरह जो व्यक्ति नदी के तट में तथा मार्ग में अग्नि तथा जल का तैल एवं ताम्बूल का दान करता है वह अधिपति होता है ॥५०॥ जो सत्यभाव से ब्राह्मण को प्रणाम करता है वह अक्षय धनी होता १०६
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know