Srishti Khanda Extracted Page 865

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-865

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

सर्वदेवस्थितस्त्वं हि सदा वायुसखस्तनौ । अन्नादिपाचनं त्वत्तो जीवनं च भवेद् श्रुवम्॥२५॥ उत्पत्तिप्रलयौ देव त्वमेको भुवनेश्वरः । त्वदृतेसर्वलोकानां दिनैकं नास्तिजीवनम् ॥२६॥ प्रभुस्त्वं सर्वलोकानां त्राता गोप्ता पिता प्रसूः । चराचराणां सर्वेषां त्वत्रसादाब्ुतं जगत् ॥२७॥ देवेषु त्वत्समो नास्ति भगवंस्त्वखिलेषु च । सर्वत्र तेस्तिसद्धावस्त्वयैव धारितं जगत् ॥२८॥ रूपगंधादिकारी त्वं रसानांस्वादुता त्वया । एवंविश्वेश्वरzः सूरो निखिलस्थितिकारकः ॥२९॥ तीर्थानां पुण्यक्षेत्राणां मखानां जगतः प्रभो। त्वमेकः प्रयतो हेतुस्सर्वसाक्षी गुणाकरः॥३०॥ सर्वज्ञः सर्वकर्ता च हर्ता पाता सदोत्सुकः। ध्वांतपंकमयघ्नश्च॒ दारिद्र्य दुःखनाशनः ॥३१॥ प्रे्येहच परोबंधुः सर्वज्ञः सर्वलोचनः । त्वदृते सर्वलोकानामुपकारी नविद्यते ॥३२॥ आदित्य उवाच पितामह महाप्राज्ञ विश्वेन्द्र विश्वभावक । ब्रूहि शीघ्रं परं यत्ते करिष्यामि मतं विधे ॥३३॥ ब्रह्मोवाच मयूखस्त्वति चंडश्च लोकानामतिदुःसहः । यथैवमृदुतामेति तथा कुरु सुरेश्वर ॥३४॥ आदित्य उवाच किरणाः कोटिकोटि में लोकनाशकराः परा: । नचाभीष्टकरा लोके प्रयोगाच्छिन्धि तान् प्रभो ॥३५॥ व्यास उवाच ततो विरिंचिना तूर्ण रविवाक्यवशाद् ध्रुवम् । आहूय विश्वकर्माणं कृत्वावत्रमयीं भ्रमिम्॥३६॥ आप सर्वदेव स्वरूप हैं । अग्नि ही आपके दोनों स्तन हैं । आप ही अन्न इत्यादि को पकाते हैं जिससे कि सभी जीवों का जीवन चलता है ॥२५॥ हे भुवनेश्वर ! आप ही जगत् की सृष्टि और प्रलय करते हैं । आपके विना किसी भी जीव का जीवन एक दिन भी नहीं रह सकता है ॥२६॥ आप ही सभी जीवों के स्वामी, रक्षक, पिता तथा माता है। आपकी ही कृपा से सम्पूर्ण चराचरात्मक जगत् बचा हुआ है ॥२७॥ हे भगवन् ! देवताओं में कोई भी आपके समान नहीं है । आपका सर्वत्र सद्भाव है,आपने ही जगत् को धारण किया है ॥२८॥ आप ही रूप तथा गन्ध को उत्पन्न करने वाले हैं आपसे ही रसों में स्वादुता आती है ।इस तरह आप विश्वेश्वर है, तथा सम्पूर्ण जगत् की स्थिति बनाये रखने वाले हैं ॥२९॥ हे प्रभो ! आप जगत् के तीर्थो, क्षेत्रों और यज्ञों के एकमात्र निश्चित कारण हैं सबों के साक्षी और गुणों के आकर है ॥३०॥ आप सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वहर्ता तथा सबों के सदा उत्सुकता पूर्ण रक्षक हैं । आप अन्धकार और कीचड़ तथा रोगों का विनाश करने वाले हैं, दरिद्रता तथा दु:ख का विनाश करने वाले है ॥३१॥ इसलोक में तथा परलोक में आप बन्धु है, सर्वज्ञ तथा सबों के नेत्र हैं । आपको छोड़कर कोई भी सम्पूर्ण लोकों का उपकार करने वाला दूसरा नहीं है ॥३२॥ आदित्य बोले-- हे महाप्रज्ञ ! विश्व के स्वामिन् तथा विश्व का कल्याण करने वाले पितामह ! आप अपने अभिमत अर्थ को शीघ्र बतलायें में आपके अभिमत कार्य को करूँगा ॥३३॥ ब्रह्माजी ने कहा-- आपकी किरणे अत्यन्त प्रखर हैं, लोकों के लिए अत्यन्त दुःसह है । हे सुरेश्वर ! आपकी किरणों में जिसतरह से मृदुता आ जाय वैसा ही आप करें ॥३४॥ आदित्य ने कहा- मेरी करोड़ों किरणें लोकों का नाश कर देने वाली हैं, वे संसार के अभीष्ट अर्थ की साधिका नहीं है, अतएव हे प्रभो ! आप इन किरणों को छँटवा दें ॥३५॥ व्यासजी ने कहा-- उसके बाद सूर्य की बातों को सुनकर ब्रह्माजी ने विश्वकर्मा को बुलाकर वज्रमय मि यंत्र को बनाकर ॥३६॥ प्रलयाग्नि के समान जो सूर्य की किरणे थीं उन सबों को छँटवा दिया । उन किरणों से ही

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know