Srishti Khanda Extracted Page 864
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-864
Sanskrit Original
तमाराध्य जना मोक्षं साधयंति द्विजातयः । संध्योपासनकालेतु विप्रा ब्रह्मविदः किल ॥१२॥ उद्वाहवो भवंत्येव ते च देवप्रपूजिताः । अस्यैव मंडलस्थां च देवीं संध्यास्वरूपिणीम् ॥१३॥ समुपास्य द्विजास्सर्वे लभंते स्वर्गमोक्षकौ । धरायां पतिततोच्छिष्टाः पूतास्ते चास्य रश्मिभि:॥९४॥ संध्योपासनमात्रेण कल्मघात्पूततां ब्रजेत् । दृष्ट्वा चांडालकं गोध्नं पतितं कुष्ठसंगतम् ॥१५॥ महापातकसंकीर्णमुपपातकसंवृतम् । पश्यंति ये नरास्सुरं ते पूता गुरुकिल्बिषात्॥१६॥ अस्योपासनमात्रेण सर्वरोगात्प्रमुच्यते । नांधत्वं न च दारिद्य न दुःखं न च शोच्यताम्।१७॥ लभते च इहामुत्र समुपास्य विरोचनम् । अदृष्टा नैवलोकैश्च देवाहरिहरादयः ॥१८॥ ध्यानरूपप्रगम्यास्ते दृष्टो देवो ह्यायं स्मृतः। देवा ऊचुः अस्तु प्रसादनाराध्यश्चास्तूपासनपूजनम् ॥१९॥ अस्यैव दर्शनं ब्रह्मन् प्रलयानलसंमितम् । सर्वे नरादयस्सत््वा मृतावस्थां गता भुवि ॥२०॥ अस्य तेजः प्रभावेण प्रणष्टास्सागरादयः । न समर्था वयं सोढुं कथमन्ये पृथम्जनाः॥२१॥ तस्मात्तव प्रसादाच्च पूजयामो यथारविम् । यजंति च नरा भत्तत्र्था तदुपायो विधीयताम् ॥२२॥ व्यास उवाच देवानां वचनं श्रुत्वा गतो ब्रह्मा खगेश्वरम् । गत्वा स्तोतुं समारेभे सर्वलोकहिताय वै ॥२३॥ क्रह्ोवाच देवत्वं सर्वलोकस्य चक्षुर्भूतो निरामयः । ब्रह्मरूपधरः साक्षाहुष्प्रक््ः प्रलयानल: ॥२४॥ इनक ही आराधना करके ब्राह्मण आदि मुक्त हो जाते हैं । ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण सन्घ्योपासन को बेला में इनको हो उपासना करते हैं ॥१२॥ लोग जो इनकी उपासना हाव को ऊपर उठाकर करते है, उससे ही इनको पूजा हो जाती है । इनके ही मण्डल में सन्ध्योपासन स्वरूपिणी गायत्री देवी विद्यमान हैं ॥१३॥ उनको हो उपासना करके समी द्विज स्वर्ग तदा मोक्ष को प्राप्त करते हैं । पृविवी पर गिरने वाली इनकी उचिछष्ट रश्मियाँ पवित्र हैं ॥१४॥ सन्ध्योपासन करने मात्र से त्राह्मण निष्पाप हो जाते हैं । चाण्डाल, गोहत्यार, पतित, कुष्ठी ॥१५॥ महापातको तथा उपपातक युक्त मनुष्यों वे देखने वाले मी जीव सूर्य का दर्शन करके महान् पातक से मुक्त हो जाते हैं ॥१६॥ सूर्य की उपासना करने मात्र से ही मनुष्य सभी रोगों से मुक्त हो जाता है । उसको दारिद्र, अन्धत्व, दु:ख तथा शोक नहीं होते हैं ॥१७।। वह इस लोक तथा परलोक में सूर्य की उपासना करके ही जिन सर्वो को मनुष्यों ने देखा भी नहीं है उन हरिहर आदि देवताओं को प्राप्त कर लेता है । ये देवता तो ध्यान रूप से बतलावे गये हैं किन्तु सूर्य देव तो दिखायी देते हैं । देवताओं ने कहा- हे व्रह्मन् सूर्यदेव को प्रसन्न करना, उपासना, आराधना और पूजन तो छोड़ दीजिये ॥१९॥ इनक दर्शन ही प्रलयाग्नि के समान है । पृथिवी के सभी मनुष्य आदि जीव मृतप्राय हो गये हैं ॥२०॥ इनके तेज के प्रभाव से सागर आदि प्रणष्ट हो गये हैं । इनके तेज को सहते में हमलोग ही समर्थ नहीं है, दूसरे जीव कैसे समर्व हो सकते हैं ?॥२१॥ जिससे कि आपकी कृपा से इनकी पूजा हमलोग कर सकें, मनुष्य भी भक्ति पूर्वक इनकी पूजा कर सकें ऐसा आप कोई उपाय कीजिये ॥२२॥ व्यासजी ने कहा-- देवताओं की वात को सुनकर ब्रह्माजी सूर्य के पास गये और जाकर सम्पूर्ण लोकों का कल्याण करने के लिए उनकी स्तुति करने लगे ।ब्रह्माजी ने कहा-- हे देव! आप सम्पूर्ण जीवों के निरोग नेत्र स्वरूप हैं; साक्षात् ब्रह्मलूपघारी तवा प्रलवाग्नि के समान दुक्ेकष्व हैं ॥२३-२४॥
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