Srishti Khanda Extracted Page 862

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-862

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Sanskrit Original

पुराणागमकर्माणि नाकेष्वत्र च बै द्विज । स्वयमाचरते पुण्यं सधरोद्धरणक्षमः॥९३९॥ बिशेषाद्वैष्णवं दृष्ट्वा प्रीयते पूजयेच्च यः । विमुक्तस्सर्वपापेभ्यस्सधरोद्धरणक्षमः ॥९३२॥ षट्कर्मनिरतो विप्रस्सर्वयज्ञरतस्सदा । धर्माख्यानप्रियो नित्यं सधरोद्धरणक्षमः ॥१३३॥ विश्वासघातिनो ये च कृतघ्ना ब्रतलोपिन: । द्विजदेवेषु विद्विष्टा: शातयंति धरां नराः ॥१३४॥ ये च मद्यरताः पापा द्यूतकर्मरतास्तथा । पाषंडपतितालापाः शातयंति धरां नरा: ॥१३५॥ सुकर्मरहिता ये च नित्योद्वेगाश्चनिर्भयाः । स्मृतिशास्तरार्थकोद्विम्ाशशातयंति धरा नराः ॥१३६॥ निजवृत्तिं परित्यज्य कुर्वति चाधमां च ये । गुरुनिंदारता द्वेषाच्छातयंति धरां नराः ॥१३७॥ दातारं ये रोधयंति पापके प्रेरयंति च । दीनानाथान्पीडयंति शातयंति धरां नराः॥१३८॥ एते चान्ये च बहवः पापकर्मकृतो नराः । पुरुषान्पातयित्वा तु शातयंति धरां नराः ॥१३९॥ य इदं श्रृणुयाद्रम्यं गुह्याहुह्णं परंहितम् । न तस्यदुर्गतिर्दुःखं दौर्भाग्यं दीनता भुवि॥१४०॥ न दैत्यादौ भवेज्जन्म स्वलोकि शाश्वतं सुखम्। नाकाले मरणं तस्य न च पापैः प्रलिप्यते॥१४९॥ इह सर्वजनाध्यक्ष स्त्रिदिवे त्रिदिवेश्वरः। कल्पं कल्पं दिवं भुक्त्वा मोक्षमार्ग व्रजत्यसौ॥ ९४ २॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे पुण्यव्यक्तिनाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः ॥७६॥ न जानने वाला होता है, वह इन गुणों से पवित्र होकर देवता हो जाता है ॥१३०॥ हे द्विज ! जो पुराण तथा आगम प्रोक्त कर्मों को इस लोक में तथा परलोक में करता है, वह पृथिवी का उद्धार करने में समर्थ होता है ॥१३१॥ जो विशेष रूप से किसी वैष्णव को देखकर प्रसन्न होता है तथा उसका पूजन करता है वह सभी पापों से रहित होकर पृथिवी का उद्धार करने में समर्थ होता है ॥१३२॥ जो ब्राह्मण सदा षट्कर्म करता है, सभी यज्ञों को करता है तथा धार्मिक कथाओं में प्रेम रखता है वह पृथिवी का उद्धार करने में समर्थ होता है ॥१३३॥ जो विश्वासघाती, कृतघ्न तवा ब्रत का लोप करने वाले होते हैं । जो ब्राह्मणों तथा देवताओं से विद्वेष रखते हैं, वे मनुष्य पृथिवी को क्षीण करते हैं ॥१३४॥ मद्य पीने वाले, पापी, जुआड़ी, पाखण्डी, पतित, वकवादी मनुष्य पृथिवी को क्षीण करते हैं ॥१३५॥ जो कभी सुकर्म नहीं करते, नित्य ही उद्वेग युक्त होते हैं तथा निर्भय होते हैं, स्मृतियों तथा शास्त्रार्थो को उद्विग्न करने वाले हैं वे मनुष्य पृथिवी को क्षीण बनाते हैं ॥१३६॥ जो अपनी वृति का परित्याग करके अधम वृत्ति को अपनाते है, द्वेष के कारण गुरुजनों की निन्दा करते हैं, वे पृथिवी को क्षीण बनाते हैं ॥१३७॥ जो दान देने वाले को रोकते हें और पाप करने के लिए प्रेरित करते हैं, दीनों तथा अनाथों को दुःख देते हैं, वे मनुष्य पृथिवी को क्षीण बनाते हैं॥१३८॥ ये सभी तथा बहुत से दूसरे पापी मनुष्य अपने पूर्वजों का पतन कराकर पृथिवी को क्षीण करते हैं॥१३९॥ जो लोग इस मनोहर और अत्यन्त गोपनीय, कल्याणकारी आख्यान सुनते हैं उनको न तो दुःख होता है और न उनकी दुर्गति होती है । उनको पृथिवी पर दुर्भाग्य तथा दीनता भी नहीं होती हैं ॥१४०॥ उनलोगों का दैत्य आदि योनियों में जन्म नहीं होता है, स्वर्ग में उनको शाश्वत सुख मिलता है । उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है और उसका पाप से संबन्ध भी नहीं होता है ॥१४१॥ वह इस लोक में सभी लोगों का स्वामी होता है, स्वर्ग में वह इन्द्र होता है । अनेक कल्पों तक स्वर्गलोक का भोग करके वह मुक्त हो जाता है ॥१४२॥ इस तरह श्रीपद्मपुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पुण्य विवेचन नामक छिहत्तरबें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।७६।। ——

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