Srishti Khanda Extracted Page 861

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-861

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Sanskrit Original

अतिपुण्याल्लभेदायुः शोभनाः पुण्यकारिण: । पापात्मानो लक्षंते5न्तं ये च दैत्यादयो नराः ॥११७॥ कृते जाताः सुरा भूमौ न दैत्याश्चान्यजातयः । त्रेतायामेकपादं च द्विपदं द्वापरे युगे ॥११८॥ संध्यायां च कलेरेव सर्वपादं च संकुलम् । देवादीनांभवेज्जातं भारतं यत् प्रवर्तितम् ॥११९॥ ये ते दुर्योधनस्यैव योधाः सैन्यादयस्तथा । ते च दैत्यादयः सर्वे ये च कर्णादयो भुवि॥१२०॥ गांगेयो वसुमुख्यश्च द्रोणो देवमुनिः प्रभुः। अश्वत्थामा हरः साक्षाद्धरिर्नदकुलोद्भवः ॥१२१॥ पंचेन्द्राः पांडवा जाता विदुरो धर्म एव च । गांधारी द्रौपदी कुंती चैतादेव्यो धरातले ॥१२२॥ देवदैत्याः कलेर्मध्ये दैत्याश्शेषे च मानवाः । उत्पत्स्यते सदा प्रेताः क्रव्यादाः पशुपक्षिणः ॥१२३॥ तेषां च कुलटा दासी नित्यकष्टा यवीयसी । नित्यं दरंद्वेषु संप्रीत्या तेषमाचार भाषिणी ॥१२४॥ किल्बिषेषु च सर्वेषु कलहेन्यायकर्मणि । रता दैत्यादयो ये ते सर्वे निरयगामिनः ॥१२५॥ वैशंपायन उवाच दैत्यादीनां मृषाभावात्सुरत्वं नसुरालयम्। कथं भोग्यं कथं सौक्ष्म्यमारोग्यं बलसंचयम् ॥१२६॥ राज्यमायुस्तथाकीर्तिरभीष्टं दयितं बलम् । नीतिविद्यादिकं भाव्यं जन्मवृद्धं सनातनम् ॥१२७॥ दानाध्ययनकर्माणि यज्ञादि च कथं प्रभो । एतदाप्ताय शिष्याय मह्यं भो वक्तुमर्हसि ॥१२८॥ व्यास उवाच दैत्यानां साहसादेव तपोभवति निश्चितम् । व्रतं यज्ञादिकं चैव संप्रीतिः स्वजनस्य च ॥१२९॥ यो दांतो विगुणैर्मुक्तो नीतिशास्रार्थतत््वगः । एतैश्च विविधैः पूतः सभवेत्सुरलक्षणः॥१३०॥ पत्नी होने पर थोड़ा सा भी सुख नहीं मिलता है । मुक्ति अथवा नरक में अपनी ही जाति वालों में प्रेम होता है।॥ ११६॥ अत्यन्त पुण्य के ही होने पर आयु की प्राप्ति अच्छे और पुण्यवान् जीवों को होती है । जो मनुष्य रूप में दैत्य होते हैं उनका नाश हो जाता है ॥११७॥ सत्ययुग में देवता भूमि पर उत्पन्न होते है, दैत्य और दूसरी जाति के नहीं । त्रेता में पाप का एक पैर रहता है, द्वापर में उसके दो पाद हो जाते हैं । संध्याकाल और कलियुग में अधर्म के सभी पैर जुट जाते हैं । जिससे भारत की प्रवृत्ति हुयी वह देवताओं आदि से ही हुयी ॥११८-११९॥ दुर्योधन के जो योद्धा तथा सेना आदि में थे वे कर्ण आदि सवके सब दैत्य थे ॥१२०॥ भीष्म प्रधान वसु थे, द्रोण देवमुनि थे। अश्वत्थामा साक्षात् शङ्कर स्वरूप थे, श्रीहरि नंद वंश के थे ॥१२१॥ पाँचो पाण्डव पाँच इन्द्र थे, धर्म ही विदुर हुए थे । गांधारी, द्रौपदी, कुन्ती ये सभी देवियाँ धरातल पर अवतीर्ण थीं ॥१२२॥ कलियुग के आदि में देवता बीच में दैत्य पृथिवी पर अवतीर्ण होते हैं । कलियुग के अन्त में मनुष्य होते हैं । जो प्रेत होते हें वे सदैव मांसभक्षी पशु एवं पक्षी रूप से अवतीर्ण होंगे ॥१२३॥ उन सबों में जो कुलटा दासी होती है तथा जो छोटी स्री होती है, वह सदा कष्टप्रद होगी । वह कलह में प्रेम रखती है और आचार का उपदेश करती है ॥१२४॥ सभी पापों को करने वाले, कलह करने में तथा न्याय करने में जो दैत्य आदि लगे रहते हैं, वे नरक में जाते हें ॥१२५॥ वैशम्पायन ने कहा-- दैत्य आदि तो सदा मृषाभाषी होते हैं, उनमें न देवत्व होता है और न वे स्वर्गलोक में जाते हैं । उन सबों को भोग्य पदार्थो की प्राप्ति, सौख्य, आरोग्य, बल ॥१२६॥ राज्य, आयु, कीर्ति, अनीति तथा प्रिय वल तथा नीति, विद्या आदि कैसे प्राप्त होते हैं उनको ये सभी चीजें जन्म से ही समृद्ध होती है क्या 2॥१२७॥ वे दान, अध्ययन तथा यज्ञादि कमों को कैसे करते हैं ? इन सारी बातों को आप बतलाएँ मैं आपका आप्त (प्रामाणिक) शिष्य हुँ॥१२८॥ व्यासजी ने कहा-- दैत्यों में साहस होने के कारण वे निश्चित रूप से तप करते हैं । उन्हें अपने लोगों में प्रेम होता है तथा वे व्रत, यज्ञ आदि भी करते हैं ॥१२९॥ जो दान्त, दुर्गुणों से रहित तथा नीतिशास्त्र के तत्त्व को

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