Srishti Khanda Extracted Page 860

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-860

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

हिरदादि नरा ये च ज्ञायंते दूरदर्शिनः | एवमादिक्रमेणैव विजानीयान्नरेषु च ॥१०२॥ सुराणां लक्षणं बूमो नररूपंव्यवस्थितम् | द्विजदेवातिथीनां च गुरुसाधुतपस्विनाम् ॥१०३॥ पूजा तपोरतो नित्यं धर्मशास्त्रेषु नीतिषु । क्षमाशीलो जितक्रोधः सत्यवादी जितेंद्रियः ॥१०४॥ दयालुर्दयितो लोके रूपवान्मधुरस्वरः । वागीशः सर्वकार्येषु गुणी दक्षो महाबलः ॥१०५॥ साक्षरश्चापि विद्वांश्च गीततृत्यार्थतत्त्ववित् । आत्मविद्यादिकार्येषु सर्वतंत्रीस्वरेषु च ॥१०६॥ हविष्येषु च सर्वेषु गव्येषु च निरामिषे। सद्योगास्वादद्रव्ये च प्रत्यग्रे चातिशोभने॥९०७॥ गंधमाल्येषु वस््रेषु शास्तरेष्वाभरणेषु च। संप्रीतश्चातिथौ दाने पार्वणादिषु कर्मसु ॥१०८॥ स्नानदानादिभिः कार्ये व्रतैर्यज्ञैः सुरार्चनैः । कालो गच्छतिपाठैश्च नक्लीबं वासरं भवेत् ॥१०९॥ अयमेव मनुष्याणां सदाचारो निरंतरम्। देववन्मानवाचारो गीयते मुनिसत्तमैः ॥१९०॥ किंतु सत्त्वाधिको देवो मनुष्यो भीत एव च। गंभीरः सर्वदा देवः सदैव मानवो मृदुः ॥१११॥ ह्ृयोःस्तुत्या च संप्रीतिर्नदैत्यादौ भवेत्किल । प्रीतिभावं परं सौख्यं सौहृदंसुकृतं शुभम् ॥१९२॥ दैवमानुषयोरेव दैत्यराक्षसयोस्तथा । प्रेतादीनां च प्रेतेषु पशौ प्रीतिः पशोरपि॥१९१३॥ काकादयः स्वजातौ च तथान्ये च स्वजातिषु । प्रीता भवंति चाप्रीता विद्या तेषां च लक्षणम्॥९९४॥ एवं पुण्यावशेषेण सविशेषासु जातिषु। प्रियाप्रियं विजानीयात्पुण्यापुण्यं गुणागुणम् ॥१९५॥ दंपत्योर्नसुखं किंचिज्जातिभेदान्नणां भुवि। स्वजातिषु भवेत्प्रीतिर्मुक्तौ वा निरयेपि वा ॥१९६॥ वाला ॥९८-१००॥। तथा जो कच्चा मांस खाता है उसकी ध्वनि से ही वृक आदि डर जाते हैं ॥१०१॥ जो दूर देखते हैं, वे मनुष्य पूर्व जन्म के हाथी जाने जाते हैं । इसीतरह क्रमश: नरों को जानना चाहिए ॥१०२॥ मनुष्य रूप से रहने वाले देवताओं का मैं लक्षण बतलाता हूँ । ब्राह्मण, देवता, अतिथि, गुरु, साधुजन तथा तपस्वियों की पूजा करने वाले, तपस्या करने वाले, धर्मशास्रं तथा नीतिज्ञों में रत रहने वाले, क्षमाशील, अपने क्रोध को जीत लेने वाले, सत्य बोलने वाले, बोलने में निपुण, सभी कार्यो को करने में गुणी तथा दक्ष, महाबलवान् ।॥।१०३-१०५॥ साक्षर, विद्वान् गीत तथा नृत्य के तत्त्वों को जानने वाला, आत्मविद्या आदि के कार्या में सभी तंत्रों (शास्त्रों) तथा स्वरों में, सभी प्रकार के हविष्यों तथा मांस रहित हव्य पदार्थो में, अच्छे स्वाद तथा द्रव्य में तथा सुन्दर ज्ञान में॥१०६-१०७॥। चन्दन, माला, वस्त्र, अलङ्कार के विषय में प्रसन्न रहने वाला पार्वण श्राद्ध आदि कर्मों में अतिथियों को दान देने में ॥१०८॥ स्नान तथा दान आदि कार्य में, ब्रत तथा यज्ञ आदि के द्वारा देवताओं के पूजन द्वार एवं पाठ करने में जिसका समय बीतता है, जिसका दिन व्यर्थ ही नहीं बीतता है । वह पूर्व जन्म का देवता होता है ॥१०९॥ यही सदाचार मानवों का भी होता है । श्रेष्ठ मुनियों ने मनुष्यों का आचार देवताओं के ही समान बतलाया है ॥११०॥ किन्तु देवताओं में सत्त्वगुण अधिक होता है, मनुष्य में भय होता है देवता सदा गम्भीर होता है और मनुष्य मृदु होता है ॥१११॥। इन दोनों को प्रशंसा करने पर प्रसन्नता होती है, दैत्यों में ऐसा नहीं होता है । देवता तथा मनुष्यों में ही परस्पर में सौख्य, प्रेमभाव, सौहार्द, पुण्य, कल्याण होते हैं । दैत्यों और राक्षसों में परस्परमें प्रेम आदि होते हैं । प्रेतों आदि की प्रीति प्रेतों में ही होती है और पशु की प्रीति पशु में होती है ॥११३॥ कौओं आदि का प्रेम अपनी जाति में ही होता है तथा दूसरे जीव भी अपनी जाति वालों से ही प्रेम रखते हैं । तथा प्रसन्न एवं अप्रसन्न होते हैं देवताओं और मनुष्यों में विद्या पायी जाती है ॥११४॥ इसीतरह पुण्य विशेष के कारण विशिष्ट जातियों में, प्रियत्वाप्रियत्व, पुण्य, अपुण्य, गुण तथा दोष आदि होते हैं ॥११५॥ भिन्न-भिन्न जाति के पति और

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know