Srishti Khanda Extracted Page 859

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-859

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Sanskrit Original

ने श्रीपद्यमहापुराण व्यास उवाच इत्युक्त्वा परमप्रीतः संगृह्य च धनं स्वकम्। क्षिप्रं स च तया सार्धं ययौ सीमांतरं द्विजः ॥८७॥ स्थित्वा पश्यत्पुरी तावत्स्थिरं तिष्ठति पूर्ववत् । स चाह तं पतिं साध्वी पुरी चेयं न नश्यति ॥८८॥ विमृश्य तामुवाचेदं विप्रवर्यस्सुविस्मितः। किंनु तिष्ठति तत्रैव द्रव्यमस्मदगृहाद्ृहिः ॥८९॥ विचार्य सा धवं प्राह मया भ्रांत्या उपानहौ । नानीते तिष्ठतस्तत्र धारयिष्यामि किंनु वै ॥९०॥ एवमुक्तृवा पतिं साध्वी गृहीत्वा ते उपागता । पत्युरभ्याशतो दृष्टं पुरं निर्व्यथनं गतम् ॥९१॥ ततो विप्रादयो वर्णाः कच्चराः पुरवासिनः । तिष्ठंति नरके घोरे दुःखिताश्चापुनर्भवे ॥९२॥ कृच्छाद्यमपुरं यांति नास्ति तेषां च निष्कृतिः । पूतिगंधं ततो मेध्यं वर्जनीयं प्रकीर्तितम्॥९३॥ पूर्ववद्धक्षणे प्रीतो ह्यद्य पापं करोति च । स्तेयशीलो निशाचारी बुधै्ञेयस्स वंचकः॥९४॥ अबुधः सर्वकार्येषु अज्ञातः सर्वकर्मसु। समयाचारहीनस्तु पशुरेव सबालिशः ॥९५॥ एवमुष्टरादयस्संति भक्षादिनकुलादयः । हिंस्रो ज्ञातिजनोद्वेगीरते युद्धे च कातरः ॥९६॥ विधसादिप्रियो नित्यं नरः श्वाकीर्तितोबुधैः । चौर्यकर्मरतो नित्यं बहुमित्रप्रवंचक: ॥९७॥ मिथुने कलहो नित्यं मर्त्यस्तु परिकीर्तितः । प्रकृत्या चपलो नित्यं सदाभोजनचंचलः ॥९८॥ प्लवगः काननप्रीतो नरः शाखामृगो भुवि । सूचकोभाषया बुध्या स्वजनेन्यजनेषु च॥९९॥ उद्देगजनकत्वाच्च सपुमानुरगः स्मृतः। बलवान्क्रांतशीलश्च सततं चानपत्रपः ॥१००॥ पूतिमांसप्रियो भोगी नृसिंहस्समुदाहतः । तत्स्वनादेव सीदंति भीता अन्ये वृकादयः ॥९०१॥ अपनी पत्नी के साथ उस नगर की सीमा से बाहर चला गया ॥८७॥ वहाँ खड़ा होकर उसने देखा कि वह नगरी पहले के ही समान स्थित थी । उस साध्वी ने अपने पति से कहा कि नगरी तो विनष्ट नहीं हुयी ॥८८॥ विचार करके उस ब्राह्मण ने पत्नी से कहा कौन सी हमलोगों की वस्तु हमारे घर के बाहर छुटी हुयी हैं ॥८९॥ विचार करके उसने अपने पति से कहा भ्रमवशात् आपके दोनों जूतों के में वहाँ छोड़ आयी हूँ । वे ही वहाँ पड़े हैं क्या में उसे लाऊँ?॥९ ०॥ इसतरह से कहकर वह साध्वी उन दोनों जूतों को लेकर आयी अपने पति के समीप खड़ी होकर उसने देखा कि नगरी जल गयी ॥९१॥ उसके कारण सभी ब्राह्मण आदि मलिन लोग जो उस नगर में रहते थे वे अपुनर्भव नामक नरक में दुःखी होकर रहते हैं ॥९२॥ वे कष्टपूर्वक यमपुरी जाते हें किन्तु उनका उद्धार नहीं होता। इसीलिए अमेध्य पूतिग्रंथ वर्जित कहा गया है ॥९३॥ पहले के ही समान भक्षण करने के कारण जो आज भी पाप करता है जो चोरी करता है, तथा रात्रि में संचरण करता है उसे विज्ञों को वंचक समझना चाहिए ।॥९४।। जो सभी कार्यों में आज्ञ होता है तथा सभी कर्मो में आज्ञात होता है, जो नियमों का पालन नहीं करता है वह मूर्ख पशु ही होता है॥॥९५॥। इसीतरह ऊंट आदि होते हैं तथा भक्षादि नेवले आदि होते हैं । जो अपने ज्ञाति जनों को उद्विग्न करता है, वह पूर्वजन्म का हिंस्र जीव होता है । उद्देजक कर्मरत तथा युद्ध में कायर ॥९६॥ विघस पदार्थो को प्रेम पूर्वक खाने वाला पूर्वजन्म का कुत्ता होता है । सदैव चोरी करने वाला तथा जिसके बहुत मित्र होते हैं, वह प्रवञ्चक होता है।९७॥ जिन पति-पत्नियों में सदा कलह होता है वह मनुष्य कहा गया है जो स्वभाव से चंचल होता है तथा भोजन का लालची होता है जो कूदता रहता है, तथा वन में प्रसन्न रहता है, वह पूर्वजन्म का वानर होता है । जो अपने लोगों को तथा दूसरों को भाषा तथा बुद्धि से सूचित करता है, तथा उन सबों को उद्विग्न करता है वह पूर्वजन्म का सांप होता है । वह मनुष्य पूर्वजन्म का सिंह होता है जो, बलवान् उछलते रहने वाला, सदा निर्लज्ज रहने

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