Srishti Khanda Extracted Page 858
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-858
Sanskrit Original
समृद्धिरद्धतो गेहे लोकविस्मयकारिणी। ततः परस्पराच्छुत्वा सर्वैरैव च तत्पुरे ॥७५॥ कृतं कर्मदुराचारं श्रुत्वा लोभादसाधुभिः। गुरुलोभाच्च सुमहत्स्वांते पंकं विशत्यपि ॥७६॥ पंकादेवभयान्मोहान्मतिभ्रंशो भवत्ततः। अथकिल्बिषकूटेन दग्ध मेव पुरं च तत् ॥७७॥ खियोदुष्टा जना दुष्टाः सर्वे पापबलात्तदा । वृद्धो ज्ञाता द्विजस्तत्र तत्कार्ये न मतिं दधौ ॥७८॥ तस्य भार्या तदा साध्वी पुरुदुःखेन संयुता । भर्तारं कृच्छूसन्तप्ता पुरकार्यं जगाद सा॥७९॥ ब्राह्मण्युवाच कष्टं मे वर्तते नाथ दृष्ट्वा त्वां दुः खसंयुतम् । ग्रामाचारमिमं यद्वाप्यपरं कतुर्मर्हसि॥८ ०॥ व्यास उवाच ततस्तत्रसदोषज्ञः स्मित्वा वचनमब्रवीत् । द्विज उवाच यस्तु जीवति पापेन त्यक्त्वाधर्मं परं हितम् ॥८ १॥ स वैधेयो महाभागे प्रगच्छत्यपुनर्भवम्। एते विप्रा दुराचाराः सदारास्सपरिच्छदाः ॥८ २॥ अतिपातकयोगाच्च महापातकसंमताः । सह पापेन महता प्रयास्यंति रसातलम्॥८ ३॥ अंतेऽपुनर्भवं प्राप्यापराधांतो नविद्यते। अहमेकोऽत्र तिष्ठमि स्वपुण्यपरिरक्षणात् ॥८४॥ व्यास उवाच ततस्सा तमुवाचेदं लोकहास्यं वचस्तव । वक्तुमर्हसि नश्चाग्रे न पुरोन्यस्य कस्यचित् ॥८५॥ द्विज उवाच यदि यास्यामि चान्यत्र इतोऽहं तत्क्षणात्प्रिये। सवित्तैः स्वजनैरेव पुरीयास्यत्यधोगतिम् ॥८ ६॥ कैसे हो गया ?॥७३॥ उसने प्रसन्नता पूर्वक उस वृत्तान्त को कह दिया । उसके बाद वह ब्राह्मण समयानुसार वैसा ही करने लगा ॥७४॥ उसके कारण उस घर में आश्चर्यित कर देने वाली समृद्धि हो गयी । उसके बाद उस नगर में एक दूसरे से उस बात को जानकर सभी लोग वैसा ही करने लगे ॥७५॥ उस बात को सुनकर सभी अज्ञानी दुष्ट दुराचारमय वैसा ही कर्म करने लगे । बहुत अधिक लोभ के कारण अन्तःकरण में बहुत बड़ा पाप प्रवेश कर जाता है ॥७६॥ उस पाप के कारण ही मति भी भ्रष्ट हो गयी । उस पाप समूह के कारण सारा नगर ही जल गया ॥७७॥ उस पाप के बल से स्त्रियाँ तथा सभी लोग दुष्ट हो गये । एक ज्ञानी वृद्ध इस पाप को नहीं करना चाहा ॥७८॥ उसकी पत्नी साध्वी थी और अत्यधिक दु:ख से दुःखी थी । अपने पति को कष्ट से सन्तप्त देखकर नगर में होने वाले कार्य को उसने बतलाया ॥७९॥ ब्राह्मणी ने कहा-- हे नाथ आप को दुःखी देखकर मुझे बहुत कष्ट है । इस गाँव में लोग जैसा कर्म करते हैं, वैसा ही अथवा कोई दूसरा कर्म आप कीजिये ॥८०॥ व्यासजी ने कहा-- उसको सुनकर दोषों के जानकार वे ब्राह्मण बोले । ब्राह्मण ने कहा-- अति पातक करने से महापातक होता है । महान् पाप से पापी रसातल में चले जाते हैं ॥८३॥ अन्त में अपुनर्भव नरक में जाने पर पापों का कभी अन्त नहीं होता है । में अपने पुण्य की रक्षा करने के लिए अकेला यहाँ रहता हूँ ॥८४॥ व्यासजी ने कहा-- उसके बाद उसने कहा कि आपकी यह बात लोगों के लिए उपहासास्पद है । हमारे सामने आप कहते हैं दूसरे किसी के सामने इसे नहीं कहेंगे ॥८५॥ ब्राह्मण ने कहा- हे प्रिये ! यदि में यहाँ से कहीं अन्यत्र चला जाऊं तो यह नगरी जनों और धनों के साथ विनष्ट हो जायेगी ॥८६॥ व्यासजी ने कहा-- इसतरह से अत्यन्त प्रसन्नता से वह ब्राह्मण अपने धन को लेकर १०५
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