Srishti Khanda Extracted Page 857
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-857
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुराण उग्रेण तपसा कश्चित्सुरत्वं लभते दिवि। वासुदेवं समाराध्य प्रह्लादः सुरपूजितः ॥५९॥ हरं तथान्धको दैत्यः स्तुत्वा तत्सभ्यकोभवत्। तस्यैव गणमुख्यत्वं लेभे भृंगी महाबलः ॥६०॥ एते चान्ये च बहवो बलिरिंद्रो भविष्यति । गच्छन्ति सद्वतिं तात इहामुत्र च सर्वदा ॥६१॥ केचिद्दैत्यकुले जाताः पृथिव्यां सुरसत्तमाः । भावयंति पितृन्सर्वान् शतशोऽथ सहस्त्रशः ॥६२॥ एकेनापि सुपुत्रेण कुलत्राणं च धीमता। एकोपि वैष्णवः पुत्रः कुलकोटिं समुद्धरेत्॥६३॥ जितेंद्रियोपि धर्मात्मा द्विजदेवार्चने रतः । क्षये धर्मे कलौ शेषे पुरे जनपदेषु च ॥६४॥ एको रक्षति धर्मात्मा पुरे ग्रामं जनं कुलम् । चिज्ञातृमेदुरं चासीद्वाह्मणानां पुरं महत् ॥६५॥ तत्र सर्वे द्विजाः शश्चत्संध्योपासनतत्पराः। वेदपाठरता धीरा देवातिथिद्विजार्चकाः ॥६६॥ यजञव्रताभ्निकर्माणः षदट्कर्मपरिनिश्चयाः । अतिकृच्छे च तेषां वै न पापे वर्तते मनः ॥६७॥ कुर्वति सततं वारा ब्रतं यज्ञं सनातनम्। कदाचिद्दैवयोगाच्च गृहस्थश्च स कोविदः ॥६८॥ वहौ जुहोति विप्रर्षिराज्यं मंत्रेण मंत्रवित् । तस्मिन् काले च तस्यैव मूत्रकृच्छ्ं सुदारुणम् ॥६९॥ तत््रोज्झतुं गतः सोपि रक्षार्थ स्थाप्य चेटिकाम् । तस्यास्त्वनवधानेन शुना चाज्यं च भक्षितम् ॥७०॥ भिया तया ततः पात्रं स्वीयमूत्रेण संभृतम् । असंलक्ष्याजुहोदग्रौ स विप्रस्त्वरया ततः ॥७१॥ आश्चर्य च ततो वह्नौ लक्षितं तेन तत्क्षणात् । कूट हेममयं साक्षात्स्वर्णं जांबूनदप्रभम् ॥७२॥ गृहीत्वा तन्मुदा विप्रः पापयोगं चकार ह । पप्रच्छविस्मयाद्दासी कथमेतद्दद॒ प्रिये ॥७३॥ मुदा तत्र यथा वृत्तं कथितं तु तया द्विज। ततो नित्यं यथाकालं तच्च तस्य प्रवर्तते ॥७४॥ यमलोक में उग्र तपस्या करके कोई भी देवत्व को प्राप्त कर लेता है । प्रह्लाद भगवान् वासुदेव की आराधना करके देवताओं से पूजित हुए ॥५८-५९॥ उसीतरह अन्धकासुर भगवान् शिव की आराधना करके उनका गण वन गया । महाबलवान् भृङ्गी नामक शङ्करजी का मुख्य गण अन्धकासुर ही हुआ ॥६०॥ इसतरह के इन सबों के अतिरिक्त बहुत से दैत्य हुए । वलि भी इन्द्र होने वाले हैं हे तात ! इसतरह से ही जीव इस लोक में तथा परलोक में सद्रति को प्राप्त करते हैं ॥६१॥ कुछ देवश्रेष्ठ पृथिवी पर जन्म लेकर सैकड़ों तथा हजारों वार पितरों की पूजा करते हैं॥६२॥ एक भी बुद्धिमान पुत्र अपने वंश का उद्धार कर देता है । एक भी वैष्णव पुत्र अपने करोड़ों पूर्वजों का उद्धार कर देता है ॥६३॥ कलियुग के अन्त में धर्म का क्षय हो जाने पर नगर में अथवा जनपद में जितेन्द्रिय, धर्मात्मा, ब्राह्मण तथा देवताओं की पूजा करने वाला एक भी धर्मात्मा, नगर, ग्राम तथा जनपद की रक्षा करता है । विज्ञातृमेदुर नामक ब्राह्मणों का महान ग्राम था ॥६४-६५॥ वहाँ के ब्राह्मण सदैव सन्ध्योपासन करते रहते थे । वेद पाठ करते थे तथा देवताओं एवं अतिथि की पूजा करते थे ॥६६॥ यज्ञ करते थे, व्रत करते थे तथा अग्निहोत्र करते थे एवं षटकर्म करते थे । अत्यन्त विपत्ति में भी उन सबों का मन कभी पाप कर्म में प्रवृत्त नही होता था ॥६७॥ वे सदा सनातन व्रत तथा यज्ञ करते रहते थे । एकवार संयोग वशात् एक विद्वान् गृहस्थ ॥६८॥ घी से मन्त्र द्वारा होम कर रहा था । उस समय उसको भयङ्कर मूत्र कृछू का रोग उत्पन्न हुआ । उसकी रक्षा करने के लिए वह चेटी को नियुक्त करके लघुशङ्का (पेशाब) करने चला गया । दासी की अनवधानता के कारण घी को कुत्ता खा गया ॥६९-७०॥ भय के कारण दासी ने अपने मूत्र से घी के पात्र को भर दिया । उसे जाने बिना वह ब्राह्मण शीघ्रता से अग्नि में होम कर दिया ॥७१॥ उसने उस समय अग्नि में आश्चर्य देखा । उसने उसमें चमकते हुए सुवर्ण कूट (समूह) को देखा ॥७२॥ ब्राह्मण ने उस सुवर्ण पिण्ड को प्रसन्नता से ले लिया और पाप कर्म करने लगा । उसने अपनी दासी से कहा कि यह
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