Srishti Khanda Extracted Page 856

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-856

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Sanskrit Original

दारुणाचारनिरता नित्यं छलपरायणाः । नपुष्णंति सुतास्तातं प्रसुवं च गुरूनपि ॥४६॥ न शुश्रूषंति वै भृत्याः स्वामिनं गुणशालिनम्। भर्तारं न स्त्रियः काश्चिच्छ्षशुरौ च स्वमातरः ॥४७॥ नित्यकष्टा नरास्तत्र कलहश्च गृहे गृहे । नृपाम्लेच्छाः सुरापाश्च तथामंत्रिपुरोहिताः ॥४८॥ मनुष्यैश्च बलिस्तेषां मत्स्यैर्मासैर्निरामिषः । पाषंडायासयोगेभ्यः प्रधाना गुणवार्तयोः ॥४९॥ कनिकैः कोलिलैर्मदैर्व्याप्तं तैस्तु महीतलम् । ततोन्योन्यं प्रिया मूढा वनेवा नगरेषु च॥५०॥ भक्ष्याभक्ष्यं समश्नंति मत्स्यमांसादिकं नराः । वने द्विजातयश्चान्ये भुंजते चानुपापकम्॥५१॥ भक्तिमंतं पशुं चान्यत्सर्वे यांत्यपुनर्भवम् । पातयन्ति पितृन्पापाः सर्वे ते पूर्वदेवकाः ॥५२॥ पिशाचा राक्षसा ये च मर्त्यका गुह्यका ध्रुवम् । एते चाविनयप्रीता न देवा न च मानुषा:॥५३॥ संजय उवाच कथंच मर्त्यभावेषु लक्षं जानंति तात्विकाः । एतं मे संशयं नाथ दूरीकुरुत तत्त्वतः ॥५४॥ व्यास उवाच कृतपापानुरूपास्तु द्विजातिष्वन्यजातिषु। असुरा राक्षसा प्रेताः स्वभावं न त्यजंति ते ॥५५॥ जाता ये चासुरामत्ये सदा ते कलहोत्सुकाः । कुहकाः कच्चराः क्रूराः विज्ञेया राक्षसा भुवि॥५६॥ जनोद्विम्मादिकं दानं तथा देवार्चनं भुवि । उग्र भावाद्धनं लब्ध्वा राज्यं भुञ्जति शाश्वतम् ॥५७॥ जयं शौर्यादिकं पुण्यं पुनःपापक्षयं ब्रजेत् । एवमुर्व्या तथा नाके नागलोके यमालये ॥५८।! आगमों तथा संहिताओं का श्रवण नहीं करता है । वे मद्य मांस को प्रेमपूर्वक खाते-पीते हैं, पापी तथा भयङ्कर मांस मक्षी हो जाते हैं ॥४५॥ उन सबों का आचार भयङ्कर हो जाता है तथा वे सदा छल करते रहते हैं । वे अपने पुत्र, पिता, माता तथा गुरुजनों का पालन नहीं करते हैं ॥४६॥ भृत्य भी गुणी स्वामी की सेवा नहीं करते हैं । खियाँ अपने पति, श्वसुर तथा सासुओं की सेवा नहीं करती हैं ॥४७॥ वे सभी लोग सदा कष्ट में रहते हैं तथा प्रत्येक घर में कलह होता रहता है । राजागण म्लेच्छ तथा मदिरापान करने वाले हो जाते हैं और उनके मन्त्री तथा पुरोहित भी उसी प्रकार के हो जाते हैं वे लोग निरामिष बलि पूजा मनुष्यों, मत्स्यो, भांस से करते हैं । पाषण्ड आयास तथा योगों की उनकी गुण तथा वार्ता में प्रधानता होती है ॥४९॥ धनिक, पंकिल (पापी) तथा मन्द पुरुषों से पृथिवी व्याप्त हो जाती है । उसके कारण वनों तथा नगरों में परस्पर में प्रिय मूर्खो का निवास होता है ।५०॥ लोग भक्ष्य, अभक्ष्य, मत्स्य तथा मांस आदि खाने लगते हैं । वन में जाकर ब्राह्मण भी उन पापियों के यहाँ भोजन करते है ॥५१॥ भक्ति युक्त पशु तथा दूसरे सभी अपुनर्भव नरकों में चले जाते हैं । वे पापी पहले देवता रहे हुए अपने पितरों को भी नरक में गिरा देते हें ॥५२॥ पिशाच, राक्षस, मर्त्यक, गुह्यक (यक्ष) ये सभी धृष्टता से प्रसन्न होते हैं देवता और मनुष्य नहीं ॥५३॥ संजय ने कहा-- तात्त्विक पुरुष मनुष्यों में होने वाले लक्षणों को कैसे जानते हैं । हे नाथ ! मेरे इस संशय को आप दूर करें ॥५४॥ व्यासजी ने कहा-- अपने पूर्वकृत पापों के अनुकूल होने वाले स्वभाव को ब्राह्मणों तथा अन्य जातियों में भी असुर, राक्षस तथा प्रेत अपने स्वभाव को नहीं त्यागते हैं ॥५५॥ जो असुर मनुष्य हो जाते हैं, वे सदा कलह करने के लिए तैयार रहते हैं । कुहक (मन में कपट रखने वाले) कच्चर (मलिन स्वभाव वाले) तथा क्रूर जीवों को सदा पृथिवी का राक्षस जानना चाहिए । वे सदा दान करते हैं, जिससे लोगों में उद्विग्तता आ जाय तथा वैसा ही देवार्चन करते हैं । अपनी उग्रता के कारण धन प्राप्त करके सदा राज्य भोगते हैं ॥५७॥ विजय, पराक्रम आदि से पुण्य तथा निष्पाप हो जाते हैं । इसीतरह से पृथिवी पर स्वर्गलोक में नागलोक में तथा

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