Srishti Khanda Extracted Page 854
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-854
Sanskrit Original
गवाशिनो दुरात्मानो हाभक्ष्यभक्षणे रताः । कीटयोनिं व्रजंत्येते तरवश्च पिपीलिकाः ॥९७॥ नमंत्रेषु नदेवेषु कल्पते ते सुरद्विषः । अग्रजः सहजस्तेषां सदृङ्गोग्राम्यवृत्तयः ॥१८॥ लोमकेशप्रणेतारः क्रव्यभक्षरता भुवि । साहसं च व्रतं दानं स्नानं यज्ञादिकं च यत् ॥१९॥ मत्स्यमांसादिषु प्रीता मृषावचनभाषिणः । सदाकामास्सदालोभास्सदाक्रोधा मदान्विताः ॥२०॥ वधबंधरतोद्वेगा द्यूतसंगीतसंप्रियाः । कुभृत्याः कुजनप्रीताः पूतिगंधरतानराः ॥२१॥ न देवेषु न विज्ञेषु न धर्मश्रवणेषु च । स्तोत्रमंत्रादिके पुण्ये यथा कार्येष्वनिश्चयाः ॥२२॥ बहुरोगाधिरोषाश्च बहुरूपपरिच्छदा । नरजातिषु दैत्यानां चिल्वान्येतानि भूतले॥२३॥ न जानंति परंलोकं न गुरुं स्वं न चापरम् । गर्भपूरणमिच्छंति नातिथिं न गुरून् द्विजान्॥२४॥ न देवं न सुतं गोत्रं न मित्रं न च बान्धवम् । स्वप्रे दानं न जानंति भक्षणान्नपरिच्छदम्॥२५॥ गोपायंति धनं यस्मात्ते यक्षा नररूपिणः । प्राणांतेपि धनं किंचिन्नदिशंति च राजनि॥२६॥ ते यक्षा दुर्गतिस्थाश्च परार्थे भारवाहकाः । प्रेतानां लक्षणं यद्वा सर्वलोकविगर्हितम्॥२७॥ ख्रीणां च पुरुषाणां च शृणुष्वैकमना मम । मलपंकधरा नित्यं सत्यशौचविवर्जताः॥२८॥ दंतकुंतलवस्त्राणां वपुषोमलसंचयाः । गृहपीठादिपात्राणां सकृच्छौचं न रोचते॥२९॥ न पश्यंति सुखं स्त्रीणां विशंति कानने द्रुतम् । विघसोच्छिष्टपूतीनां भक्षणेऽभिरता भुवि ॥३०॥ जिन सबों को वमन कर दिया तथा दूसरों के गोत्र में निवास करने वाले ॥१५॥ वे वंश से उत्पन्न दैत्य हैं, तथा जिन सबों का कारण पाप हे, वे सभी मरकर दुर्गति को प्राप्त करते हैं तथा जो ब्राह्मण, स्त्री तथा बच्चों को मारते हैं ॥१६॥ गोमांस खाने वाले, पापी अभक्ष्य भक्षण करने वाले ये सभी मरकर कीड़ों की योनि में चले जाते हैं, वृक्ष हो जाते हैं, और चींटी हो जाते हैं ॥१७॥ मन्त्रों और देवताओं में विश्वास नहीं करने वाले, देवताओं से द्वेष करने वाले उनके लिए अग्रज सहजन्म होता है । उनकी वृत्ति उन सबों के समान नहीं होती है, रोओं और केशों को बनाने वाले मांसभक्षी, साहसकि यज्ञ, दान और व्रत करने वाले ॥१८-१९॥ मछली मांस आदि से प्रसन्न रहने वाले, झूठ बोलने वाले । हमेशा कामना करने वाले, सदा लोभ करने वाले, सदा क्रोध करने वाले तथा मदमत्त रहने वाले ॥२०॥ हत्या करने वाले, किसी को बाँधकर रखने वाले, जूआ तथा सङ्गीत ही जिनको प्रिय है, दुष्टों की नौकरी करने वाले, दुष्टों से प्रेम करने वाले, दुर्गन्धि पदार्थो में रत रहने वाले ॥२१॥ देवता विद्वान् धर्मश्रवण, स्तोत्रों मंत्रों आदि कार्या में विश्वास नहीं करने वाले ॥२२॥ बहुत अधिक रोगी रहने वाले, बहुत अधिक क्रोध करने वाले, अनेक प्रकार का सजावट करने वाले, ये सभी मनुष्य जाति में उत्पन्न हुए दैत्यों के लक्षण हैं ॥२३॥ जिन्हे परलोक का ज्ञान नहीं है न तो अपने या दूसरे के गुरु को मानते हैं । उनकी इच्छा सदा सन्तान उत्पन्न करने की बनी रहती है, वे गुरु और ब्राह्मण का महत्त्व नहीं देते हैं ॥२४॥ वे देवता, पुत्र, गोत्र, मित्र तथा बान्धव को मानते ही नहीं है । वे स्वप्न में भी अन्न तथा वस्त्र का दान देना नहीं जानते हैं ॥२५॥ वे सदा धन की ही रक्षा में लगे रहते हैं, ऐसे लोग मनुष्य रूपधारी यक्ष हैं । प्राण भले ही चला जाय किन्तु वे राजा को थोड़ा सा भी धन नहीं देना चाहते हैं ॥२६॥ ऐसे जीव नारकीय तथा यक्ष होते है और दूसरों के लिए भार वहन करते रहते हैं । सभी लोकों में निन्दित स्री तथा पुरुष प्रेतों का लक्षण सावधानी से सुनो । वे लोग सदा मल और कीचड़ से सने रहते हैं । झूठ बोलने वाले, अपवित्र रहने वाले ॥२८॥ उनके दांत, केश, वस्त्र तथा शरीर मैल से भरे रहते हैं । वे कभी भी अपने गृह, बैठने के आसन तथा पात्रों को साफ करना नहीं चाहते हैं ॥२९॥ वे स्तरियो के सुख को नहीं देखते हैं ।
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