Srishti Khanda Extracted Page 853
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-853
Sanskrit Original
असंख्याता इमे दैत्या्रैलोक्ये सचराचरे। अद्याप्यासन्गताः कुत्र एतन्मे शंस भो गुरो ॥२॥ व्यास उवाच येमृतास्संमुखे शूरा दैत्यानां प्रवरा रणे । स्वयं प्राप्य च देवत्वं भोग्यमश्चन्ति शाश्वतम् ॥३॥ प्रासादा यत्र सौवर्णा नानारत्मविभूषिताः। सर्वकामप्रदा वृक्षाः स्वर्णदी तोयसंयुता ॥४॥ पद्योत्पलसुकह्णरैर्गन्थढ्यैरन्यपुष्पकै : । दधिदुग्धाज्यखंडैश्च युतापुष्करिणी शुभा ॥५॥ अतीव रूपसंपन्नाः सदैव नवयौवनाः । तत्र राज्यं प्रकुर्वंति तथैव वसुधातले ॥६॥ एवं जन्माष्टकं प्राप्य धनिनो ध्यक्षमंत्रिणः। अर्धसंमुखगात्रेण दिवमश्रंति शाश्चतम्॥७॥ विमुखाः कातरा भीता ये च मायाविनो रणे । ते यांति निरयं घोरं ये च देवद्विजद्विषः॥८॥ पतितं मूर्छितं भम्रमन्योद्धारमाहवे । हंतारो निरयं यांति ते च म्लेच्छाः कुवाचकाः ॥९॥ परन्यासापहर्तारो विमुखास्संति तत्त्वतः । रात्रौ वा पिपिने नष्टे चोरास्साहसकारिणः ॥१०॥ सर्वभक्षरता मूढा म्लेच्छा गोब्रह्मघातकाः । कुवाचकाः परे म्लेच्छा एते ये कूटयोनयः ॥१९॥ तेषां पैशाचिकी भाषा लोकाचारो न विद्यते । नास्ति शौचं तपो ज्ञानं नदेवपितृतर्पणम्॥१२॥ दानश्राद्धादिके यज्ञे सुराणां च प्रपूजनम् । पितृणां च न शुश्रूषा द्विजदेवतपस्विनाम्॥१३॥ ज्ञानलोपादतस्तेषां मलशौचं न विद्यते । मातरं भागिनीं चान्यां गृहिणीं कामयंति च ॥१४॥ सर्वो विपर्ययो लोकात्सदाचारो मलीमसः । ताक्ष्यस्योद्रमनानां च अन्येषां गोत्रवासिनाम् ॥१५॥ कुलजातास्सदा दैत्या येषां पुण्यमकारणम्। दुर्गतिं च मृता यांति द्विजस्त्रीशिशुघातिनः ॥९६॥ गति प्राप्त हुयी उसे सुनना चाहता हूँ ॥१॥ ये असंख्य दैत्य सचराचर जगत् में आज भी थे, वे कहाँ गये उसे आप मुझे बतलायें ॥२॥ व्यासजी ने कहा-- जो दैत्यप्रवर युद्ध में सामने युद्ध करते हुए मरे वे देवत्व को प्राप्त करके भोग्य पदार्थों का भोग करते हैं ॥३॥ वहाँ सुवर्ण के महल बने हैं और वे सभी रत्नों से अलंकृत हैं । वहाँ स्वर्गीय नदी के जल से युक्त सभी कामनाओं को पूरा करने वाले वृक्ष है ॥४॥ स्वर्ग में पुष्करिणियाँ दही, दुग्ध तथा घृत खण्ड से युक्त हैं, कमल, नीलकमल, कह्लार तथा दूसरे सुगन्धित पुष्पों से वे परिपूर्ण हैं ॥४।। अत्यन्त रूप सम्पन्न तथा सदा नवीन जवानी से युक्त वे वहाँ राज्य करते हैं, जैसे पृथिवी का कोई राजा होता है ।॥।६।। इस तरह वे आठ जन्म प्राप्त करके धनिक, धनाध्यक्ष राजा के मन्त्री होते हैं । अर्ध संमुख शरीर से वे अक्षय स्वर्ग भोगते हे ॥७॥ जो युद्ध में पराडमुख होने वाले, कायर, भयभीत तथा माया करने वाले देवताओं तथा ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले दैत्य थे वे अत्यन्त घोर नरक में हैं ॥८॥ पतित, मूर्छित, भग्न दूसरे के साथ युद्ध करने वाले को मारने वाले नरक में जाते हैं । गालियाँ देने वाले म्लच्छ होते हैं ॥९॥ दूसरों के घर को हड़पने वाले तथा युद्ध से पलायन करने वाले, रात्रि में अथवा वन में मरने वाले चोर तथा साहसिक कर्म करने वाले ॥१०॥ सब कुछ खाने वाले, अज्ञानी, म्लेच्छ, गौ तथा ब्राह्मण को मारने वाले, कुवाक्य बोलने वाले, तथा म्लेच्छ ये कूटयोनि वाले हैं ॥१९१॥ वे पिशाचों की तरह बोलते हैं उनमें लोकाचार नहीं होता है । पावित्र्य के पालन से रहित उनमें तपस्या तथा ज्ञान का अभाव होता है । वे देवताओं और पितरों का तर्पण नहीं करते हैं ॥१२॥ दान तथा श्राद्ध आदि यज्ञों में देवताओं की पूजा भी नहीं करते हैं । वे अपने माता-पिता की सेवा नहीं करते ब्राह्मण देवता और तपस्वियों की भी वे सेवा नहीं करते हैं ॥१३॥ उनके ज्ञान का लोप हो जाता है, अतएव उनके मल का पवित्रीकरण नहीं होता है ।वे माता, बहन तथा दूसरों की स्त्री को प्राप्त करना चाहते हैं ॥१४॥ उनके सारे आचरण लोक विपरीत होते हें, और वे पापी होते हैं । गरुड ने
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