Srishti Khanda Extracted Page 850

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-850

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Sanskrit Original

मुखेन जग्राह रुषा त्रैलोक्यं सचराचरम् । भूमंडल॑ समुद्धत्य विवेश च रसातलम् ॥७२॥ शेषाश्चव विविशुर्दैत्यास्तमनुप्रीतिसंयुताः । ततो विष्णुर्महातेजा ज्ञात्वा दैत्यबलं महत् ॥७३॥ दधार रूपं वाराहं दैत्यराजजिघांसया । धृत्वा क्रोड़तनुं विष्णुर्विवेश तमनुद्रुतम् ॥७४॥ तत्र गत्वा रसामूले रसातलगतां महीम् । दृष्ट्वा स्वर्दष्टरयोर्दश्रे लोकाथारां वसुंधराम् ॥७५॥ तां धृत्वा गच्छतस्तस्य विष्णोरमिततेजसः । समाजगामदैत्येंद्रो धृष्टं वाग्भिस्तुदन्ननु ॥७६॥ मायाक्रोडतनुर्विष्णुर्दर्वचांसि सहन् रुषा । जलोपरि दधारेमां धरां भूधर एव च॥७'७॥ तस्यां न्यस्य स्वसत्वं च स चकार तदाचलाम् । तत: पश्चात्स संलग्रो दैत्यराट्समुपस्वितः ॥७८॥ क्रोधेन महताविष्टो जघान गदया हरिम् । मायया सूकरो विष्णुस्तां गदां समवंचयत्॥७९॥ योगयुक्तो यथा मृत्युं कौमोदक्याहनच्च तम् । ततः पुनारुषाविष्टो हिरण्याक्षो महावलः ॥८०॥ मुष्टिना प्राहरद्देवे दक्षिणे तु भुजे प्रभोः। एवं युद्धं महाघोरं सव्यासव्यं गतागतम्॥८ १॥ परिभ्रमणविक्षेपं कृतानुकरणं तथा । ततो ब्रह्मादयो देवा युद्धं पश्यांति खेस्थिताः ॥८ २॥ स्वस्ति प्रजाभ्यो देवेभ्य ऋषिभ्यश्चेति चाब्रुवन् । ऊचुश्च देवदेवेशं विष्णुं वाराहरूपिणम् ॥८३॥ माक्रीड बालवद्देव जह्ममु देवकंटकम् । ततोविष्णुर्महातेजा मायावाराहरूपधृत् ॥८ ४॥ ब्रह्माद्यनुमर्ति प्राप्य चक्रं प्राक्षपदुल्वणम् । सहत्रसूर्यसंकाशं सहस्रारं महाप्रभम् ॥८ ५॥ दैत्यांतकरणे रौद्रं प्रलयाग्निसमप्रभम् । तच्चक्र विष्णुना मुक्त हिरण्याक्षं महाबलम् ॥८६॥ ~ = गये । उसके वाद वह महासत्व दानव वामन के समान बढने लगा ॥७१॥ क्रुद्ध होकर उसने सचराचर तैलोक्व ळो मुख दे पकड़ लिवा और उसमें से भूमण्डल को उठाकर पाताल में प्रवेश कर गया ॥७२॥ बचे हुए दैत्य भी उसके पीछे प्रेम पूर्वक पताल में चले गये । उसके वाद महातेजस्वी भगवान् विष्णु उस दैत्य के बल को जानकर ॥७३॥॥ दैत्वणज के मार देने की इच्छा से वाराह का रूप बना लिये । सूकर का रूप बनाकर भगवान् उसके पीछे ही पाठाल में प्रवेश कर गये ॥।७४॥। वहाँ पर जाकर रसातल में गयी हुयी पृविवी को देखकर उन्होंने वसुन्धरा को अपने दाँत पर रख लिया ॥॥७५॥ पृथिवी को अपने दाँतों पर रखकर जाते हुए निस्सीम तेजस्वी भगवान् विष्णु के पीछे उन्हें गालिवाँ देते हुए वह दैत्य दौड़ पड़ा ॥७६॥ माया से सूकर शरीर धारण करने वाले भगवान् विष्णु उसके दुर्वचनों के ऋरोधपुर्दक सहते हुए पृथिवी तथा पर्वतों को जल के ऊपर स्थापित कर दिए ॥७७॥ उस पृथिवी में अपने वल के स्वापित करके उसे ये अचला बना दिए । उनके पीछे लगा हुआ दैत्यणज मी वहाँ उपस्थित हो गया ॥७८॥ अत्यन्त क्रुद्ध दैत्य ने विष्णु पर अपनी गदा से प्रहार किया । माया से सूकर बने हुए भगवान् विष्णु ने उस गदा को विफल बना दिया ॥७९॥ उसके पश्चात् योगयुक्त श्रीभगवान् ने उस पर अपनी कौमोदकी गदा से प्रहर किया । उसके वाद ऋध करके हिरण्याक्ष ने श्रीविष्णु पर मुक्के से उनकी दाहिनी भुजा पर प्रहार किवा । इसतरह दर्ये-बाये पैतरे से दोनों में बुद्ध होने लगा ॥८०-८१॥ परिश्रमण करने में विक्षेप भी हुआ । उस समय ब्रह्मा इत्यादि देवता आकाश में स्थित होकर युद्ध देख रहे वे ॥८२॥ ऋषियों आदि ने प्रजाओं, देवताओं और ऋषियों का कल्याण हो इसतरह से देवाराध्व वराहरूपधारी भगवान् विष्णु से कहा ॥८३॥ हे देव ! इसके साथ क्रीडा न करें । इस देवताओं के शत्रु को शेख मारिये । उसके वाद माया से बाराह रूप धारण करने वाले भगवान् विष्णु ने ॥८४॥ ब्रह्मा आदि को अनुमति आप्त करके भयङ्कर हजारों सूयो के समान, महान कान्ति वाले सहस्रार चक्र को फेंका ॥८४-८५॥ वह दैत्यों को मारने वाला, अग्नि के समान कान्ति वाला चक्र था । भगवान् विष्णु के द्वार प्रक्षिप्त उस च्छ ने महाबलवान् ॥८६॥ उस दैत्य १०४

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