Srishti Khanda Extracted Page 849

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-849

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण ववर्ष बहुर्भिर्विष्णुं क्रोधाविष्टेन चेतसा । तांस्तु तेनैव प्रहितांश्चिच्छेद सुरसत्तमः ॥५६॥ शरैदीप्तैर्महाघोरैरसुराणां भयङ्करैः। विव्याध सर्वगात्रेषु शंभुशूलोपमैश्शरैः ॥५७॥ दानवाधिपतिः संख्ये ह्याव्ययो हरिरीश्वरः । स च कश्मलतां गत्वा सर्वशक्तिमनुत्तमाम् ॥५८॥ कालजिह्वोपमां घोरामष्टघंटासमन्विताम्। हरेरुरसि पीने च दिद्वुत्या पातयदद्रुतम् ॥५९॥ शुशुभे ससुरश्रेष्ठस्तटित््वत्सान्द्रमेधवत् । ततश्च चुक्कुशुर्दैत्या जयेति साधुवादिनः ॥६०॥ ततश्चक्रं दैत्यसैन्ये दानवारिर्व्यसर्जयत् । तेषां शिरांसि संच्छिद्य माधवं पुनरागमत् ॥६१॥ स दैत्यं शक्तिपातेन पातयामास वै रणे। चिरात्संज्ञां समालम्ब्य वह्विबाणेन केशवम् ॥६ २॥ निजघान रणे कुद्धो हरिः कौबेरमाक्षिपत् । ततो मुमोच मायास्त्रं चासुरं चातिदारुणम्॥६३॥ सिंहव्याघ्रलुलायांश्च तद्वदद्विपसरीसृपान्। जघान समरे विष्णुं हिरण्याक्षः प्रतापवान् ॥६४॥ ततो मायास्बसंभूतान् शस्तरात्रौधान् रणे हरिः । प्रचिच्छेद शरैरेव शूलेनैकनमताडयत्॥६५॥ सविह्ृलितसर्वागस्तत्क्षणं लोहितोक्षितः । विचकर्ष हरन्विष्णुर सृग्विप्लुतविग्रहः ॥६६॥ तच्छूलं च त्रिभिर्बाणैः प्रविव्याध सुराधिपः । वरूथं सध्वजं केतुं रथं चैवातपत्रकम् ॥६७॥ यंतारं च प्रचिच्छेद दशभिश्च हरिः शरैः । पातिते च रथे दैत्यः संप्लुत्याथ रथं परम् ॥६८॥ आरुरोह स दैत्येंद्र: संमुखं चाकरोद्वली । ततो युद्धं महाघोरमभवल्लोमहर्षणम्॥६ ९॥ हिरण्याक्षस्य च हरेलोकविस्मापनं महत् । अस्रयुद्धं तथान्योन्यं कृतप्रतिकृतं च तत् ॥७०॥ ततो नियुद्धे सततं दिव्यवर्षशतं गतम् । ततो दैत्यो महासत्वो ववृधे वामनो यथा॥७१॥ कठोर त्रिशूलों.तथा फरसों आदि से प्रहार किया उन सवों को भी श्रीभगवान् ने असुरों के लिए भयङ्कर देदीप्यमान बाणों से काट दिया और उस दैत्य के सम्पूर्ण शरीर को शङ्करजी के त्रिशूल के समान बाणों से बेध दिया । उसके कारण प्रपीडित उस दैत्य ने सभी शक्तियों में श्रेष्ठ ॥५५-५८॥ काल की जिह्वा के समान भयङ्कर आठ घण्टाओं वाली शक्ति से श्रीमगवान् के वक्षःस्थल में प्रहार किया ॥५९॥ उसका प्रहार करके वह दैत्य विद्युत युक्त काले मेघ के समान सुशोभित हुआ । उस समय प्रसन्न होकर सभी दैत्य हिरण्याक्ष का जय-जयकार करने लगे ॥६०॥ उस समय श्रीहरि ने दैत्यों पर अपना चक्र चलाया और वह उन सबों के शिर को काटकर पुन: श्रीभगवान् के पास आ गया ॥६१॥ उन्होंने शक्तिपात के द्वारा दैत्य हिरण्याक्ष को रणस्थल में गिरा दिया । दीर्घकाल के बाद होश में आकर क्रुद्ध होकर उसने अग्निबाण से भगवान् केशव को मारा तो श्रीहरि ने कोबेरास्त्र का उस पर प्रहार किया । उसके बाद हिरण्याक्ष ने असुर नामक भयङ्कर मायाख्र का प्रयोग किया ॥६३॥ वह सिंह, व्याघ्र, लुलाव हाथी तथा सर्प स्वरूप था । उससे हिरण्याक्ष ने विष्णु पर प्रहार किया ॥६४॥ उसके बाद मायास्र से उत्पन्न शस्त्रो तथा अखों को श्रीहरि ने बाणों से ही काट दिया फिर दैत्य ने भगवान् पर त्रिशूल से प्रहार किया । उसके कारण भगवान् का सारा अङ्ग व्याकुल हो गया और वे लहूलुहान हो गये । खून से लथपथ शरीर वाले भगवान् ने उस त्रिशूल को खींच लिया और तीन बाणों के प्रहार से तोड दिया । उन्होने उसके रथ के बरुथ,ध्वजा, पताका, छत्र तथा ॥६५-६७॥ सारथि को दश बाणों से विनष्ट कर दिया । उस रथ के विनष्ट हो जाने पर वह दैत्य कूदकर दूसरे रथ पर जा बैठा ॥६८॥ और श्रीभगवान् से युद्ध करने लगा उसके बाद हिरण्याक्ष और श्रीहरि में भयङ्कर तथा लोमहर्षक (रोगंटे खड़ा कर देने वाला) युद्ध हुआ ॥६९॥ हिरण्याक्ष और श्रीहरि का वह युद्ध संसार को विस्मित कर देने वाला था । उन दोनों ने एक-दूसरे के विरुद्ध असन युद्ध किया ॥७०॥ इसतरह निरन्तर युद्ध करते हुए देवताओं के सौ वर्ष बीत

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