Srishti Khanda Extracted Page 848

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-848

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

वसून्सर्वाश्च सशरैः सिद्धगंधर्वपन्नगान्। दशाष्टदशाभिः षडिभर्युद्धे देवान् भिनत््यसौ ॥४०॥ ओजीौघादतिवीर्यात्तु शीघ्रलाघवर्दशनात् । आपत्य्राप्ताः सुरा भीत्या प्रतिकर्तुं न चेश्वराः ॥४१॥ महेशा शूलसंकाशैः शरैर्मर्मविभेदिभिः । ताडिता निर्जरा युद्धे मूर्च्छिता धरणीं ययुः ॥४२॥ तस्यैव संमुखे स्थातुं न शेकुः प्रवरास्सुराः। ततो देवा विनिर्धृता्िदिवेशेन संयुताः ॥४३॥ शरण्यं ते हरिं तत्र शरेण ताडिता ययुः । एतस्त्रिंतरे विष्णुः प्राह जिष्णुं खगेश्वरम् ॥४४॥ अधुना गच्छ दैत्यस्य संमुखं रणमूर्धनि । नाशाय स ततस्तूर्णंगतस्तस्यांतिकं जवात् ॥४५॥ सरथं मार्गणैर्भित्वा विष्णुमारोधयज्जवम् । रथस्य संमुखे दैत्य उवाच विष्णुमव्ययम् ॥४६॥ अन्यसृष्टिंकरोम्यद्य हत्या त्वां च सनिर्ज्जरम् । ततो विष्णुरुवाचेदं गर्जतं दैत्यपुंगवम् ॥४७॥ शक्तस्त्वं स्पर्द्धने पाप यदि युद्धेस्थिरो भव । ततः शरशतैरेव जघानविष्णुमव्ययम्॥४८॥ असंप्रांतः सचिच्छेद यमदंडनिभान् शरान् । पुनः शरसहस्राणि प्रेरयामास तं रणे ॥४९॥ तां श्रछित्वा शरैः शौरिस्तं चविव्याधमार्गणैः। प्रगौरवादहार्याभैः संस्पर्शाद्वाडवानलैः ॥५०॥ शरैश्च भेदकैस्तीक्ष्णैः खगमैश्च मनोजवैः । लाघवात्केशवास्त्रस्य तूलशुष्कतृणोपयैः ॥५९॥ हैमैः शरसहस्रैस्तु ताडितो दैत्यपुंगवः । बाधयाभ्यर्दितः क्रुद्धो धृत्वाशिखरिणं रणे॥५२॥ जघान माधवं वेगाद्धिरण्याक्षो महाबलः । तं च संचूर्णयामास गदया लीलया हरिः ॥५३॥ एवं पर्वतसाहस््रं पातितं तु क्रमेण हि । तथैव लाघवाच्चूर्णं हरिणादानवारिणा ॥५४॥ पुनर्वाहुसहसतराणि कृत्वासौ दानवोत्तमः । शरैः शक्तिभिरत्युप्रैः शूलैः परशुकादिभिः।५५॥ तथा सर्पो को क्रमश: दश, आठ, दश तथा छह वाणों से मारा ॥४०॥ पराक्रम की अतिशयता तथा शीघ्रता प्रदर्शन के कारण विपत्तिग्रस्त देवता भय के कारण उसका प्रतिकार नहीं कर सके ॥४१॥ शङ्करजी के त्रिशूल के समान मर्मभेदी बाणों से युद्ध में मारे गये सभी देवता मूर्छित होकर पृथिवी पर गिर पड़े ।।४२।। उसके सामने बड़े-बड़े देवता नहीं ठहर सके । इसतरह से पराजित समी देवता इन्द्र के साथ ॥४३॥ सवों के रक्षक श्रीहरि के शरण में गये। उस समय विष्णु ने जिष्णु गरुड से कहा ॥४४। इस समय तुम समरांगण में दैत्यराज के समक्ष चलो । गरुड उस दैत्य का नाश करने के लिए वेग से उसके पास गये ।॥४५। उस समय भगवान् विष्णु को गरुड़ के साथ भेदन करके उसने गरुड़ के बेग को रोक दिया । रथ के सामने आकर वह दैत्य अव्यय विष्णु से कहा ॥४६॥ आज मैं देवताओं के साथ तुम्हार वध करके दूसरी सृष्टि करूंगा । उस गरजते हुए दैत्य श्रेष्ठ से भगवान् विष्णु ने कहा।।४७॥ अरे पापी ! यदि युद्ध करने में तुम समर्थ हो तो युद्ध करो उसके बाद उसने सैकड़ों बाणों से भगवान् विष्णु को मारा॥४८॥ उसने भगवान् को यमदण्ड के समान बाणों से छेद दिया । उसके बाद उसने फिर भगवान् पर हजारो बाणों को छोड़ा उन बाणों को काटकर भगवान् ने उसको भी बाणों से छेद दिया वे बाण अत्यन्त गौरव सम्पन्न, अहार्य तथा बाडवाग्नि के समान ऊष्ण थे ॥५०॥ वे आकाशगामी तीक्ष्ण, भेदन करने वाले तथा मन के समान वेग वाले थे । भगवान् के अस्र तूल तथा सूखे तृण के समान हलके थे ॥५१॥ सुवर्ण निर्मित हजारो बाणों से श्रीमगवान् ने उस दैत्य को मारा । उस वेध के द्वारा क्रुद्ध होकर दैत्य ने पर्वत को धारण करके उससे माधव के ऊपर प्रहार किया । उस पर्वत को भगवान् ने बड़ी आसानी से अपनी गदा के प्रहार से चूर-चूर कर दिया ॥५२-५३॥ इसतरह से हिरण्याक्ष ने भगवान् पर हजारों पर्वतों को गिणया और दानवों के शत्रु श्रीहरि ने उन सबों को उसी प्रकार चूर-चूर कर दिया ॥५४॥ उसके वाद वह क्रुद्ध दानव हजारों भुजाओं को बनाकर बहुत अधिक श्रीहरि पर बाणों, शक्तियों,

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know