Srishti Khanda Extracted Page 847

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-847

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Sanskrit Original

पातेन तक्षकादीनां सुधांशोः शिशिरेण च । अश्वारोही खरो मन्यो हनिपाशस्तथा गजान्॥२५॥ परिघेण गजं कुंभे दैत्यानां नाशयत्ततः । एवमश्वानाजांश्चैव लाघवात्स न्यपातयत्॥२६॥ एवंसिद्धैश्च गंधर्वैरप्सरोभिर्महाबलैः । अन्याभिर्देवताभिश्च समातृगणनायकैः॥ २७॥ निपातिता महाघोरा येते प्रलयदानवाः । शरैश्चखड्गपातैश्च शूलशक्तिपरश्वधैः ॥२८॥ यष्टिपरिघकुंतै श्च पातयंत्यसुरान्सुराः । एवं संक्षीयमाणेषु दैत्यराट् समपद्यत ॥२९॥ आदित्यर थसंकाशं रथरत्मविभूषितम्। शातकुंभमयं दिव्यं घंटाचामरभूषितम् ॥३०॥ पताकाध्वजसंपूर्ण रम्यं शक्ररथोपमम्। समारुह्य महावीरो हिरण्याक्षोऽ सुराधिपः ॥३९॥ जघान शरजालैश्च दुर्निवार्यः सुरासुरैः । ससैन्यानि गजान्वीरो रथांश्च सह सैधवान् ॥३२॥ पातयामास भूमौ च शतशोऽथ सहस्रशः । एवं चरन्सबृंदेषु निखिलेषु दिवौकसाम् ॥३३॥ पातयामास दैत्येंद्रः शरौघान्मृत्युसन्निभान्। क्रमेण समरे चाथ देवसैन्यान्समंथत ॥३४॥ यथा पुष्करिणीबृंदे गजः कंजवनं शितैः। शरपातैरथोवेगात् सिंहनादैः पुनः पुनः ॥३५॥ धरण्यां पतिता वेगात्तदा दैत्येश्वरस्य च । दशभिश्च सुतीक्ष्णग्रै र्जयंतं स जघान ह ॥३६॥ रेमंतं पंचभिर्बाणैः शक्रं पंचदशेन तु । चित्ररथं विंशतिभिः पंचविंशतिभिर्गुहम्॥३७॥ हेरंबं त्रिशरणेव चत्वारिंशच्छरैर्यमम् । तथैव कालं मृत्युं च पाणिनाद्विगुणे न च॥३८॥ गुहाकेशं जगत्प्राणं दशभिर्दशभिः शरैः । षड्भि सप्तभिश्चैव रुद्रान्सर्वान्पृथक् पृथक्॥३९॥ तथा पाशधारी वरुण ने पाश से दैत्यों का वध किया ॥२३-२४॥ तक्षक आदि के गिरने से तथा चन्द्रमा के शैत्य अश्वारोही, खर, मन्यु हनिपाश तथा हाथियों को मार दिया ॥२५॥ उन्होंने दैत्यों के हाथियों के कुम्म स्थल (मस्तक) पर प्रहार करके उन्हें मार दिया. । इसतरह उन्होंने दैत्यों के हाथियों तथा घोड़ों आदि को शीघ्र ही पृथिवी पर गिरा दिया ॥२६॥ इसी तरह सिद्धों, गन्धर्वो तथा अप्सराओं ने तथा अन्य देवताओं ने तथा मातृकाओं के नायकों ने॥२७॥ जो प्रलयंकारी भयङ्कर दानव थे उन सबों को गिरा दिया । देवताओं ने दैत्यों को बाणों तथा खडगों के प्रहार से, त्रिशूल, शक्ति, फरसा ॥२८॥ यष्टि, परिघ तथा भाला के प्रहार से दानवों को पृथिवी पर गिरा दिया । इसतरह समी दैत्यों का नाश होने पर दैत्यराज युद्ध करने के लिए आया ॥२९॥ उसका रथ सूर्य के रथ के समान रत्नों सेअलङ्कृत था । सुवर्ण निर्मित घंटा तथा चामर से वह विभूषित था ॥३०॥ वह पताकाओं और ध्वजों से भरा हुआ था, वह इन्द्र के रथ के समान मनोहर था । ऐसे रथ पर बैठकर महावीर हिरण्याक्ष जो असुरों का राजा था॥३ १॥ उसको कोई भी देवता तथा असुर रोक नहीं सकता था । वह बाण समूहों से देवताओं की सेना, हाथी तथा सैंधव घोड़ों को मारकर सैकड़ों तथा हजारों की संख्या में नीचे गिरा दिया । इसतरह देव समूह में संचरण करते हुए॥ ३ २-३ ३॥ उस दैत्येन्द्र ने काल के समान बाणों की वर्षा की । उसने क्रमश: देवताओं की सेना को मथ दिया ३४॥ जैसे पुष्करिणियों में कोई हाथी कमलवन को विनष्ट कर रहा हो उसीतरह तीक्ष्ण बाणों के प्रहार से तथा बार-बार सिंहनाद के द्वारा देवता पृथिवी पर गिर पड़े । उस समय जयन्त को वेगपूर्वक दैत्येश्वर ने दश तीक्ष्ण बाणों से मारा ।॥३५-३६॥ रेमन्त को उसने पाँच बाणों से और इन्द्र को पन्द्रह बाणों से मारा । उसने चित्ररथ को बीस बाणों से तथा स्कन्द को पच्चीस बाणों से मारा ॥३७॥ गणेशजी को तीन बाणों से तथा यमराज को चालीस बाणों से उसीतरह काल तथा मृत्यु को दश-दश बाणों से उसने मारा ॥३८॥ कुबेर तथा वायु को दश-दश बाणों से उसने मारा । उसने प्रत्येक रुद्रों को अलग-अलग छह तथा सात बाणों से मारा ॥३९॥ उसने सभी वसुओं, सिद्धों, गन्धर्वो

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