Srishti Khanda Extracted Page 844
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-844
Sanskrit Original
सगजोदशनैरेव स्फोटयामास वै गिरिम्। एवं शतसहस्राणि सैन्यानि सैन्यपालकान् ॥२८॥ पातयामास समितौ गजः परमदुर्जयः । सदैत्यस्तस्य पृष्ठस्थः शरैः कालानलप्रभैः॥२९॥ हत्वा त्वपातयच्चोर्व्या मुख्यमुख्यान् सुराधिपान् । शरैस्तस्य तदादेवा यमदंडसमप्रभैः ॥३०॥ निपतंति महावीर्या रुधिरौघपरिप्लुताः । यस्मिन्यस्मिश्च मार्गे तु सदैत्यः स गजो गतः॥३९॥ तत्र तत्र चकाराशु भीषणां संचितं शरैः। गजेन पातिता केचितद्रजारोहेण चापरे ॥३२॥ वेगेन भ्रमणेनैव सुराः केचित्प्रतापिताः । एवं सुरगणाध्यक्षाः शन्तराततरैर्विविधैश्चतम् ॥३३॥ सगजं युद्धानिर्भीता निजघ्नुर बहुभिः शरैः । तथापि ततद्वजं योद्धं न शक्तास्ते महाबलाः ॥३४॥ क्षिप्रं तांस्तु गजोदंतैस्रैपुरोऽ पातयच्छरैः । न गता ये धरण्यां च देवा जर्जरविग्रहाः ॥३५॥ शरण्यं गणपं जग्मुर्भीतास्ते वेदनातुराः। देवानां कदनं दृष्ट्वा गणधीशः प्रतापवान् ॥३६॥ सगजं ताडयामास वज्रानलसमैः शरैः । सगजो वेगसंरुद्ध: शरेण च समुत्थितः ॥३७॥ अथो तौ द्वौ शरैरेव बिभिदाते परस्परम् । उभौ तौ नर्दमानौ च अन्योन्यं जयमैच्छताम् ॥३८॥ शोणितै लिंप्तसर्वांगौ बीरमुख्यौ सुरासुरौ । अथाखुं सगजो मत्तो विभेद दशनैः स्वकैः ॥३९॥ आखुनाभिद्टुतो नागो घोरयुद्धं तयोः परम् । अधोर्ध्वं संविभागे च चतुर्भि्युद्धमद्धुतम्॥४०॥ सशब्दं तुमुलं युद्धं सर्वलोकभयंकरम् । दशनैर्दशनैरेव शरैरेवशरोत्तमैः ॥४ १॥ तद्धोरमभवद्युद्ध देवदानवसंगरे । आखुको भेदयांचक्रे महानागं महाबलम्॥४२॥ औषधि आदि के प्रयोग से हाथी को होश में ला दिया ॥२६॥ और उसमें पहले की अपेक्षा सौ गुना प्राणों का संचार कर दिया पहले उसने अभिमंत्रित जल देकर उसके अङ्गों के घावों को समाप्त कर दिया ॥२७॥ उस हाथी ने अपने दाँतों के प्रहार से पर्वतों को तोड़ दिया । इसीतरह उसने हजारों सैनिकों तथा सेनापतियों को गिरा दिया । वह हाथी अत्यन दुर्जय था । वह दैत्य उस हाथी पर बैठकर अपने कालाग्नि के समान वाणों से ॥२९॥ मुख्य मुख्य देवताओं को मारकर पृथिवी पर गिरा दिया ॥३०॥ इसके यमदण्ड के समान बाणों से खून की धारा से लथपथ होकर देवता पृथिवी पर गिर पड़े । वह दैत्य जिस-जिस मार्ग से हाथी पर सवार होकर जाता था ॥३१॥ वहाँ-वहाँ पर वह बाणों से भीषण स्थिति बना देता था । कुछ देवता हाथी द्वारा गिरा दिये गये और कुछ उस दैत्य के द्वारा ॥३२॥ उसके वेगपूर्वक श्रमण करने के ही कारण कुछ देवता संतप्त हो गये । इसतरह से देवगणों के अध्यक्षों ने अनेक प्रकार के शास्रात्रों से विना भय के उस दैत्य तथा हाथी पर वाणों से प्रहार किया । फिर भी उस हाथी से युद्ध करने में कोई समर्थ नहीं हुआ ॥३४॥ शीघ्र ही उस हाथी ने अपने दाँतों से तथा त्रैपुरि ने अपने वाणों से उन देवताओं को गिरा दिया । जर्जर शरीर वाले जो देवता पृथिवी पर नहीं गये थे वे वेदना से आतुर होकर तथा भयभीत होकर गणेशजीके शरण में गये । देवताओं का वध देखकर प्रतापी गणेशजी ने ॥३६॥ गज तथा उस दैत्य दोनों को वज्राग्नि के समान वाणों से मारा । वाणों के वेग से वह हाथी रुक गया ॥३७॥ उसके बाद वे दोनों एक-दूसरे को बाणों से वेध दिये । वे दोनों गर्जना करते हुए एक दूसरे पर विजय प्राप्त करना चाहते थे ॥३८॥ देवों तथा दैत्यों के दोनों मुख्यवीरों के सारे अंग खून से लथपथ थे । उसके वाद हाथी ने अपने दाँत से गणेशजी के वाहन चूहे को मारा ॥३९॥चूहे ने मी अपनी तीव्रता दिखायी और उन दोनों में घोर युद्ध हुआ । इसतरह उन चारों में अद्भुत युद्ध हुआ ॥४०॥ वह शब्द से युक्त भयङ्कर युद्ध सम्पूर्ण लोकों के लिए भयङ्कर हुआ । दोनों वाहन दाँत से लड़ रहे थे और दोनों वीर बाणों से ॥४१॥ उस देव दानव संग्राम में वह युद्ध भयङ्कर हुआ । चूहे ने महाबलवान् उस हाथी को काट
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