Srishti Khanda Extracted Page 843

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-843

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Sanskrit Original

ततः संज्ञां समालभ्य त्रैपुरिश्रासुरोत्तमः । समारुह्य रथं स्वं च जघान सुरसत्तमम् ॥१५॥ विशिखैरर्धचंद्रै श्च क्षुरप्रैमल्लकैस्तथा । तांस्तु चिच्छेदधर्मात्मा पुनर्विव्याध तं शरैः ॥१६॥ चतुर्भिः सैधवांश्चैव शरैकेन च सारथिम्। शरैः संपातयामास धरण्यां गणनायकान् ॥१७॥ लाघवात्तु रथं चान्यं गत्वा त्रिपुरनंदनः। विशिखैर्वज्रसंकाशैः संबिभेद गणाधिपम् ॥१८॥ रुधिरेणावसिक्तांगो रुषा घोरयमप्रभः। ललाटे च त्रिभिर्बाणैस्सप्तभिश्च स्तनांतरे ॥१९॥ चतुर्भिर्नाभिदेशे च पंचाभि ॒ु ष्टिमस्तके । संबिभेदमहाक्रोधो बलिनं शंभुनंदनः॥२०॥ शरैरर्दितसर्वागः स दैत्यो रणमूर्धनि। कश्मलं परमं गत्वा संपपात रथोपरि ॥२९॥ ततःसूतेन धीरेण अपनीतो रणाजिरात् | विमुखं नाहनच्छूरो विनायकः सुरार्चितः॥२२॥ चिरात्संज्ञां समालम्ब्य यंतारं चाब्रवीद्वच: । रपुरिरुवाच गच्छ सूत रणे भीरुं विनायकं हरात्मजम् ॥२३॥ व्यास उवाच ततो यन्ताऽब्रवीद् वाक्यं सत्यं पथ्यं च कोमलम् । सारथ्युवाच हरात्मजशरान्सोढुं कस्समर्थो रणाजिरे ॥२४॥ तस्मान्मोहगतस्त्वं च मया नीतः प्रभासुत । एतज्ज्ञात्वात्विदानी भो यद्युक्तं तद्विधीयताम् ॥२५॥ व्यास उवाच एतस्मिन्नंतरे राज्ञा प्रेरितः कविसत्तमः । औषधादिप्रयोगेण गजः संज्ञामबोधयत्॥२६॥ अकारयच्छतगुणप्राणं च जयमादिशत् । प्राग्जलं मंत्रितं दत्वा रुरोधास्याङ्गक व्रणान् ॥२७॥ गणेशजी ने दूसरे शत्रुओं को भी मार कर गिरा दिया ॥१४। उसके बाद होश में आकर तथा अपने रथ पर चढकर त्रैपुरि सुरश्रेष्ठ गणेशजी पर अर्द्धचन्द्र तथा क्षुरप्र बाणं से प्रहार किया । उन सभी बाणों को धर्मात्मा गणेशजी ने काटकर फिर उसको वाणों से विद्ध किया ॥१५-१६॥ उन्होंने चार बाणों से घोड़ों को तथा एक बाण से सारथि को मार दिया । उन्होंने उसके गणनायकों को वाणों से मारकर गिरा दिया ॥१७॥। त्रिपुरनन्दन त्रैपुरि शीघ्रता से दूसरे रथ पर जाकर व्रज के सदृश बाणों से गणेशजी को छेद दिया ॥१८॥ उस समय गणेशजी के सारे अङ्ग खून से भींग गये थे वे क्रोध के कारण यमराज के समान भयङ्कर हो गये और त्रैपुरि के ललाट को तीन बाणों से तथा सात वाणों से छाती को ॥१९॥ चार बाण से नाभि प्रदेश को तथा पाँच बाणों से मुष्टि के मस्तक को छेद दिया । उस समय शम्भु नन्दन गणेशजी अत्यन्त क्रुद्ध थे ॥२०॥ बाणों से सभी अङ्गों के पीडित होने से वह दैत्य समराङ्गण में अत्यन्त मूर्छित होकर रथ पर ही गिर पड़ा ॥२१॥ सरथि उसको रणाङ्गाण से बाहर ले गया । युद्ध विमुख होने के कारण देव पूजित गणेशजी ने उसे मारा नहीं ॥२२॥ बहुत देर के बाद होश में आकर उसने सारथि से कहा । त्रैपुरि ने कहा-- हे सूत ! उस डरपोक शङ्कर पुत्र गणेश के पास चलो ॥२३॥ व्यासजी ने कहा-- उसके बाद सारथि ने सत्य, पथ्य तथा कोमल वाणी में कहा । सारथि ने कहा-- समराङ्गण में गणेश के बाणों को वर्दास्त करने में कौन समर्थ है 2॥२४।॥ उसी के कारण आप मूर्छित हो गये थे इसीलिए मैंने आपको यहाँ लाया । इस बात को जानकर आप जो उचित हो वैसा कीजिये ॥२५॥ व्यासजी ने कहा-- इसी समय दैत्यराज ने वैद्यश्रेष्ठ को भेजा। उसने

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