Srishti Khanda Extracted Page 842
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-842
Sanskrit Original
त्ैपुरिसवाच पिता मे निहतः पित्रा तव यस्माद्रणाधिप । तस्मात्त्वामद्य विशिखैर्नयामि यमसादनम् ॥२॥ व्यास उवाच ततस्तमत्रवीद्देवो गणेशस्त्रिपुरात्मजम् । गणेश उवाच तव तातेन दुष्टेन सुराणामहितं पुरा ॥३॥ कृतं कर्म महत्पापं श्रुतं नो जनकेन हि । पापकर्मरतं दुष्टं ज्ञात्वा ज्ञानबलेन च॥४॥ अवधीत्तं शरैकेण पितरं ते बलेन च। पंकात्प्रतारितो मोहात्प्रेषितो यममंदिरे ॥५॥ त्वां चाहं तत्पथं दैत्य प्रेषयामि क्षणादिह । व्यास उवाच उक्तवंतं महाप्राज्ञं सुराणां च गणाधिपम् ॥६॥ विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः कालानलसमप्रभै:। ततः शरसहस्रैस्तु दैत्यं विव्याध साहसात् ॥७॥ यमदंडसमैर्बाणैः क्षुरप्रैश्च शिलीमुखैः । कंकपत्रैर्महातीक्ष्णै वज्रानलसमप्रभैः ॥८॥ विचकर्त शरांश्रास्य लंबोदरः सुरार्चितः । पुनर्विव्याधविशिखैः सहसाभिदुरोपमैः ॥९॥ शरैरर्दितसर्वांगो मूच्छितस्त्वपतद्धुवि । ततोभद्रश्च सौभद्रो भीषणो निर्जरांतकः ॥१०॥ स्वां स्वां गदां समादाय दुद्रुवुस्तं विनायकम् । युगपत्ते गदापातैर्निजघ्नुर्गणनायकम् ॥ १ १॥ लाघवात्तु वृथा कृत्वा गदास्तेषा महाबलः । भद्रकस्य तु शीर्षे चाहनत्परशुना तदा ॥१२॥ सौभद्रस्योत्तमांगं च असिनाग्रे निपातितम् । भीषणस्य कुठारेण खड्गेन निर्जरांतकम् ॥१३॥ पातयित्वा च हेरम्बो महागिरिसमांस्तदा । चतुरो गणमुख्यांश्च अन्यांश्चापातयदद्विद्रपः ॥९४॥ चढकर गणेजी से कहा ॥१॥ हे गणाधिप ! तुम्हारे पिता ने मेरे पिता को मार दिया हैं अतएव आज मैं तुमको बाणों के प्रहार से यमलोक भेज रहा हूँ ॥२॥ उसके बाद श्रीगणेशजी त्रिपुरात्मज से बोले गणेशजी ने कहा-- तुम्हारा पिता दुष्ट था । उसने देवताओं का अहित कर्म किया था यह मैंने अपने पिताजी से सुना है । पाप कर्म करने वाले दुष्ट तुम्हारे पिता को मेरे पिता ने एक ही बाण से ज्ञान तथा बल के द्वारा मार दिया ॥३-४।। उस अज्ञानी को उन्होंने पाप से बचाकर यमलोक भेज दिया ॥५॥ हे दैत्य ! तुमको भी मैं क्षणभर में ही उसी मार्ग पर भेज दे रहा हूँ । व्यासजी ने कहा-- इसतरह से महाप्राज्ञ गणेशजी को ॥६॥ उस दैत्य ने कालाग्नि के समान कान्ति वाले दश बाणों से बेध दिया । उसके बाद गणेशजी ने उस दैत्य को साहस पूर्वक हजारो बणों से छेद दिया ।।७।। यमदण्ड के समान क्षुरप्र तथा कंक पत्र से युक्त अत्यन्त तीक्ष्ण वज्र तथा अग्नि के समान कान्ति वाले बाणों से गणेशजी ने त्रैपुरि के बाणों को काट दिया । उसके वाद गणेशजी ने वज्र के समान वाणों से उसको विद्ध किया ॥८-९॥ बाणों से समस्त आङ्गों के विद्ध हो जाने के कारण त्रैपुरि मूर्छित होकर पृथिवी पर गिर पड़ा । उसके बाद भद्र, सौभद्र, भीषण तथा निर्जरांतक नामक दैत्य अपनी-अपनी गदा लेकर गणेशजी पर टूट पड़े और एक ही समय में गदा प्रहार गणेशजी पर किए ॥१०-११॥ गणेशजी ने शीघ्रता से उन सबों की गदाओं को विफल बनाकर भद्रक के शिर पर फरसे प्रहार किया ॥१२॥ उन्होंने कृपाण से सौभद्र के शिर को काट कर गिरा दिया, भीषण को कुठार से तथा निर्जणान्तक को खड्ग से मार दिया ॥१३॥ महान् पर्वत के समान आकार वाले उन चारो को मारकर १०३
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