Srishti Khanda Extracted Page 841

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-841

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Sanskrit Original

अध्वोर्ध्वमगमच्छव्दो ह्वाशनेश्चोपजायते । भग्ने गदे द्वयोरेव करःसंपुटितस्तयोः ॥३२॥ एवं चैवार्धयामेन तयोरस््ेनिपेततुः । एतसिन्नन्तरे बीरौ खड्गचर्मधरौ तदा ॥३३॥ प्रतियोद्धं महाघोरमाहवे संप्रचेरतुः । नित्निंशौविद्युदुल्काभौ तयोगत्रि च चर्मणी ॥३४॥ दृश्येते सर्वलोकैश्च लाघवं विस्मयं गतैः । चिच्छिदाते तयोरेव चर्मणी बहुवर्णके॥३५॥ भीष्मकं बलयुद्धं च तयोरेवं प्रवर्तते। मंडलं चक्रधन्वं च लाघवं च परीप्लुतम् ॥३६॥ वृत्रवासवयोर्यु्ध वृत्रवासवयोरिव । केशान्वृत्रस्य उत्पलुत्य संप्रधृत्यासिना द्रुतम्॥३७॥ शिरश्चिच्छेद सहसा मघवा रणमूर्धनि । जयशब्दस्ततस्त्वासीद्ेवानां च समंततः ॥३८॥ प्रोत्फुल्लहदया देवा मघवंतमपूजयन् । देवदुंदुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥३९॥ गीतं गायंति गंधर्वा मुनयः स्तुतिपाठकाः । भीताः पलायिताः सर्वे दैत्यास्त्यक्तायुधा दिशः॥४०॥ इतिश्रीपद्महापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे वृत्रासुरवधोनाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥\७७३॥ te -- चौहत्तरवाँ अध्याय व्यास उवाच चतुर्भिस्तुरगैर्जुष्टं रथं सूर्यसमप्रभं ।त्रैपुरिः संरुरोहाथाब्रवीद्वाक्यं गणाधिपम् ॥१॥ वे दोनों वीर प्राणसंकटपन्न हो गये । उसको देखने में देवता तथा दानव वीर समर्थ नहीं हो पा रहे थे ॥३०॥। ब्रह्म तथा शङ्कर आदि देवता उस अद्भुत युद्ध को देखने के लिए आकाश में स्थित थे । उन दोनों के हुंकार भरे शब्द से तथा गदा प्रहार के शब्द से वञ्रपात के शब्द से भी अधिक शब्द ऊपर की ओर फैल गया । आधे प्रहर के युद्ध में दोनों की गदायें टूट गयी किन्तु उन दोनों का हाथ संपुटित ही था ॥३१-३२॥ उसी समय उन दोनों बीरों ने खड्ग और चर्म धारण कर लिया ॥३३॥ और एक दूसरे के विरुद्ध युद्ध करने के लिए संचरण करने लगे । उन दोनों के खड्ग उल्का के समान कान्ति वाले थे तथा उनके शरीर में चर्म (ढाल) लगा था ॥३४॥ सभी लोग उसे आश्चर्यपूर्वक देख रहे थे अनेक रूपों वाला उन दोनों का ढाल छिन्नभिन्न हो गया ॥३५॥ किन्तु उन दोनों का भयङ्कर युद्ध चलता रहा । वे अत्यन्त शीघ्रता से मण्डल चल रहे थे ।।३६॥ इन्द्र और वृत्रासुर का युद्ध अनुपमेय रहा । इन्द्र ने उछल कर अत्यन्त शीघ्रता से वृत्र के केशों को पकड़ कर उसके शिर को काट दिया । उस समय सभी देवता इन्द्र का जय-जयकार करने लगे ॥३७-३८॥ प्रसन्न हृदय से देवताओं ने इन्द्र की पूजा की देवताओं ने दुन्दुभि बजायी और अप्सराओं ने नृत्य किया ॥३९॥ गन्धर्वगण गीत गा रहे थे मुनिजन इन्द्र की स्तुति कर रहे थे और सभी दैत्य आयुध छोड़कर विभिन्न दिशाओं में भाग गये ॥४०॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के इन्द्र द्वारा वृत्रवध नामक तिहत्तरवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।७३।। ---३५६७-- त्रिपुरासुर के पुत्र का वध वर्णन व्यासजी ने कहा-- उसके बाद त्रिपुरासुर का पुत्र त्रैपुरि चार घोड़ों वाले सूर्य के समान कान्ति वाले रथ पर

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