Srishti Khanda Extracted Page 840
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-840
Sanskrit Original
ततो वृत्रो महाशूलं प्राक्षिपत्रिर्जिरेश्वरे । शांभवास्त्रेण देवेशो वैष्णवारत्रं मुमोचह ॥१५॥ उभयोरंबरे चाख्न वह्विकूटसमप्रभे । अन्योन्यं जध्नतुस्तत्र स्फुलिंगानि विमुंचती ॥१६॥ स्पर्शने च स्फुलिंगानामुभयोः सेनर्यार्भटाः । न शक्ताः संमुखे स्थातुं शलभाज्वलने यथा ॥१७॥ दग्धाः पेतुः पृथिव्यां च दिशस्सर्वाः प्रदुद्रुवुः । देवदानवयोर्वीराः शून्यस्तत्राभवद्रणः ॥१८॥ अख्नं निरस्तकं दृष्ट्वा सदैत्यः क्रोधमूर्च्छितः । मायया शैलसंदोहमस्त्रं शक्रे मुमोच ह ॥९९॥ बाणौधैः शैलसंघातं प्रचिच्छेद रणे हरिः । अघोरं प्रासृजददैत्यः पुरुहूते महाबले ॥२०॥ कोटिकोटिसहस्राणि जंतूनां प्रवराणि च । सिंहशार्दूलभल्लूकवृकव्याघ्रमहागजाः ॥२९॥ दंदशूकादयः सत्वाः प्रधावंति सुरेश्वरम्। क्षुरप्रैरर्धचंद्रैश्च भल्लैः शिलीमुखैस्तथा॥२२॥ असंप्राप्तान्प्रचिच्छेद मघवा परवीरहा । ततो वृत्रो महाबाहुर्थनुरुद्यम्य वीर्यवान्॥२३॥ बिभेद शरसाहस्रैर्वज्रकल्पैः शतक्रतुम्। छित्वा क्षुरप्रैशशक्रश्च धनुस्तस्य चकर्त च ॥२४॥ सूतं चाश्चान्पृथिव्यां च पातयामास तत्क्षणात् । सकंटकां गदां भौमां संपूज्यासुरसत्तमः ॥२५॥ जघान पद्मिनः शीर्षे मोहाइंतीक्षितिं ययौ। सगजः सर्वदेवेशो धरणीं समुपस्थितः ॥२६॥ ततस्तयोर्गदायुद्धमवर्तत मुहुर्मुहुः । तयोःप्रहरतोः शब्दो गदापातोद्भवोश्रुवम् ॥२७॥ आवर्त परिवर्तं च चक्रतुस्तौ पुनः पुनः। अध ऊर्ध्व प्रहारं च पार्श्वयोरतिभीषणम् ॥२८॥ बभूवैवं तयोर्युद्धं लोकालोकभयंकरम्। दृष्ट्वा देवगणाः सिद्धा दानवा विस्मयं गताः॥२९॥ युद्धयमानौ तु तौ वीरौ मृत्युसंशयमागतौ। देवदानववीराश्च द्रष्टुं नैव तदीशिरे ॥३०॥ ईशब्रह्मादयः खे तु स्थिता द्रष्टुं तदद्धुतम् । तयोर्हुकारशब्देन गदापातस्वनेन च ॥३१॥ आकर इन्द्र ने करोड़ों बाणों का प्रहार करके वृत्र को पीडित कर दिया ॥१४॥ तदनंतर वृत्र ने इन्द्र पर महात्रिशूल चलाया । इन्द्र ने भी उस शाम्भवास् के विपरीत वैष्णवास्र को छोड़ा ॥१५॥ दोनों अस्र आकाश में परस्पर में टकरा गये और दोनों टकराकर विनष्ट हो गये ॥१६॥ उन अखों से निकली हुयी चिनगारी को दोनों सेनाओं के वीरों में कोई भी स्पर्श नहीं कर सकता था अतएव वे उन सबों के सामने ठहर न सके ॥१७॥ वे जलते हुए पृथिवी पर गिर पड़े तथा सारी दिशाएँ जलने लगीं । सभी वीर वहाँ से भाग चले और रणांगण खाली हो गया ॥१८।। अपने अस्र को निरस्त देखकर दैत्य वृत्र क्रोध से व्याकुल होकर माया से पर्वत समूह वाले अस्त्र को इन्द्र पर छोड़ा॥१९॥ इन्द्र ने अपने बाणों से पर्वत समूह को चूर-चूर कर दिया उसके बाद वृत्र ने इन्द्र पर अधोरास्र का प्रहार किया।२०॥ उससे इन्द्र पर करोड़ों हजार सिंह, शार्दूल, भालू, वृक, व्याघ्र, महानाग ॥२१॥ तथा सर्प आदि जीव दौड़ पड़े । उन सवों को अपने पास आने से पहले ही शत्रु के वीरों को मारने वाले इन्द्र ने अपने क्षुरप्र बाणों से काट डाला । उसके बाद पराक्रमी वृत्र ने धनुष उठाकर ॥२२-२३॥ हजारो वग्र के समान बाणों से इन्द्र का भेदन किया और इन्द्र ने अपने क्षुरप्र बाणों से उन बाणों को काटकर वृत्र के धनुष को भी काट दिया ॥२४॥ उन्होंने वृत्र के सारथि तथा घोड़ों को भी मार कर गिरा दिया । वृत्र ने कंटीली गदा से इन्द्र के ऐरावत के शिर पर प्रहार किया जिसके कारण हाथी बेहोश होकर पृथिवी पर गिर पड़ा । उस हाथी के साथ इन्द्र भी पृथिवी पर गिर पड़े । उसके बाद उन दोनों में बार-बार गदा युद्ध हुआ । वे दोनों जब गदा का प्रहार करते थे तो उससे भयङ्कर शब्द होता था वे दोनों बार-बार पैतड़ा चल रहे थे और ऊपर-नीचे तथा बगल में भयंकर प्रहार करते थे ॥२५-२८॥ इसतरह उन दोनों का लोक भयङ्कर युद्ध हुआ । उसको देखकर देवता, दानव, सिद्ध और गन्धर्व आश्चर्यित हो गये ॥२९॥ युद्ध करते हुए
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