Srishti Khanda Extracted Page 839

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-839

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Sanskrit Original

तिहत्तरवाँ अध्याय व्यास उवाच ततो वृत्रो महतेजा दैत्यानां प्रवरो युधि | दिग्गजाक्यं गजारूढः प््राद्रवद्वलसूदनम् ॥१॥ आगच्छंतं ततो वृत्रं शरैः कालानलप्रभैः। विव्याध सर्वगात्रेषु द्विरदस्थो महाहवे॥२॥ ततोवृत्रस्तुशीर्ष॑ च जिष्णोरेव पतत्रिणा । विव्याधसहसा तेन स चचाल महाबलः ॥३॥ आत्मानं च समाश्वास्य धनुरुद्यम्य वीर्यवान्। ववर्घ शरवर्षेण तस्य दैत्यस्य विग्रहे॥४॥ शरांश्छित्वा बिभेदाशु शरैराशीविषोपमैः। शतक्रतुं महावीर्यः सर्वदेवाधिपं युधि॥५॥ ततः शरसहस्रैस्तु दैत्यं विव्याध देवराट् । परस्परं शरा यांति यथासप्ताश्वरश्मयः ॥६॥ एवं शरसहस्रैस्तु विभिदाते परस्परम्। मनोजवसमाः शीघ्रा गाढा: शिखरिणो यथा ॥७॥ बडवानलसंस्पर्शाः खगावञ्रार भेदकाः । तयोर्थनुष्मतो युद्धे शरास्तुल्यगुणान्विताः ॥८॥ एवं क्रमेण युद्धे च अहोरात्रमवर्तत। महेंद्रो द्विरदं तस्य शूलनैव जघान ह॥९॥ स निपत्य महीपृष्ठे लाघवात्स्वरथं ययौ । रथस्थस्तस्य देवस्य शक्त्या चैरावणं दृढम् ॥१०॥ बिभेद लाघवेनाशु वञ्रेणेव महागिरिम् । शुशुभे कंपमानस्तु सेंद्रः स च महागजः ॥१९॥ ततः शक्तिं समादाय आविध्य मघवाऽसुरम् । बिभेदोरसि दैत्यस्य सपपात रथोपरि ॥१२॥ क्षणात्सज्ञां समालंब्य सविनद्य पतत्रिणा । बिभेद समरे शक्रं स ततः कश्मलं गतः ॥१३॥ इंद्र: संज्ञां पुनः प्राप्य जघान विशिखैः शितैः । शतकोटिसमै बाणैरर्दितो व्यथयान्वितः॥१४॥ __ इन्द्र के द्वारा वृत्रासुर का वथ वर्णन व्यासजी ने कहा-- उसके बाद महातेजस्वी, युद्ध करने में दैत्यों में श्रेष्ठ, वृत्रासुर दिग्गज के समान विशाल हाथी पर बैठा हुआ इन्द्र पर टूट पड़ा ॥१॥ आते हुए वृत्रासुर को देखकर हाथी पर सवार इन्द्र ने कालाग्नि के समान कान्ति वाले बाणों से उसके सम्पूर्ण अङ्गों को बेध दिया ॥२॥ उसके बाद महाबलवान् वृत्र ने बाणों से इन्द्र के शिर को ही छेद डाला ॥३॥ अपने को सम्हाल कर तथा धनुष उठाकर पराक्रमी इन्द्र ने बाणों की उस दैत्य के शरीर पर वर्षा की ।।४॥। वृत्र ने भी इन्द्र के बाणों को काटकर सर्पो के समान जहरीले बाणों से देवराज इन्द्र का भेदन किया ॥५॥ उसके बाद हजारो बाणों से देवराज इन्द्र ने दैत्य का भेदन किया । उस समय बाण सूर्य की किरणों के समान एक दूसरे पर आ जा रहे थे ॥६॥ इसतरह दोनो परस्पर में एक-दूसरे को हजारो बाणों से वेध दिए । वे बाण मन के समान वेग वाले पर्वत के समान कठोर, वाडवाग्नि के समान ऊष्ण, आकाश में चलने वाले तथा वज्र के भी आकार का भेदन कर देने वाले थे । उन दोनों धनुर्धारियों के बाण एक समान गुण वाले थे ॥७-८॥ इसतरह से क्रमशः युद्ध करते हुए दिन और रात दोनों बीत गये । उसके बाद वृत्रासुर ने इन्द्र के हाथी पर त्रिशूल से प्रहार किया ॥९॥ वृत्रासुर पृथिवी पर कूदकर शीघ्रता से अपने रथ पर चला गया और रथ पर बैठे हुए उसने शक्ति से ऐरावत पर प्रहार किया ॥१०॥ उसने ऐरावत पर शीघ्रता से उसी प्रकार प्रहार किया जैसे महान पर्वत पर वज्र से प्रहार किया गया हो । इन्द्र के साथ वह हाथी काँप गया ॥११॥ उसके बाद इन्द्र ने शक्ति से उस महादैत्य के वक्षःस्थल में प्रहार किया और वृत्रासुर अपने रथ पर ही गिर गया ॥१२॥ क्षणभर में होश में आकर उसने जोर से गर्जना किया और बाणों से इन्द्र पर प्रहार किया उसके कारण इन्द्र मूर्छित हो गये ॥१३।। उसके बाद होश में

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