Srishti Khanda Extracted Page 838

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-838

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Sanskrit Original

मधुरुवाच स्वामी तु मे सुरश्रेष्ठ त्वयैव पातितो युधि ॥२७॥ अहं त्वां च हनिष्यामि सुतौस्कंदविनायकौ । व्यास उवाच उक्तवंतं च दैतेयं जघान बहुमार्गणैः ॥२८॥ सपपातमहीपृष्ठे गतासु लोहितोद्विरः । पितरौ निहतौ दृष्टवा मायाबद्धो महाबलः ॥२९॥ स्कंदः शक्तिं समादाय प्रायाद्योद्धयितुं हरिम् । ततो धाताऽब्रवीद्वाक्यं स्कंदं मोहप्रपीडितम् ॥३०॥ ब्रह्मोवाच पश्य ते पितरौ दूरे पश्यंतौ युद्धमीदृशम् । अंतरिक्षे भ्रमंतौ च संस्थितौ लोकसाक्षिणौ ॥३१॥ व्यास उवाच एतच्छुत्वा ततो दृष्टवा तत्रैवांतरधीयत । ततो धुंधुश्च सुंधुश्च प्रातरावतिदर्पितौ ॥३२॥ वधं प्रति हरेर्युद्धे पेततुर्गरुडोपरि । खड्गहस्तं च थुंधुं च सगदं मुंधुमेव च ॥३३॥ चिच्छेद नंदकेनैक गदया सादयत्परम् । पेततुस्तौ धरापृष्ठे प्रवीरौ क्षतविक्षतौ ॥३४॥ मधुस्तदा गतस्तूर्णमंतर्धानं तमोवृतः। पातयामास विष्णौ च मायया शतपर्वतान् ॥३५॥ ततस्तान्पर्वतांश्र्छित्वा तमसोऽन्तर्गतो युधि । क्रोधात्सुदषशनिनैव शिरश्छित्वा निपातितः ॥३६॥ ततो ब्रह्मादिभिर्देवैश्शंभुना त्रिदशैरपि । मधुसुदन इति ख्यातिर्विष्णोलोकिषु कारिता ॥३७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे मधुवधो नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥७२॥ aie अनेक प्रकार के बाणों से श्रीहरि पर प्रहार किया । मधु ने कहा-- हे सुरश्रेष्ठ मेरे स्वामी को तुमने ही मारा है॥२७॥ मैं तथा मेरे दोनो पुत्र स्कन्द और गणेश तुम्हे मार डालेंगे । व्यासजी ने कहा-- इसतरह से कहने वाले उस दैत्य को श्रीहरि ने बहुत से वाणों से मारा ॥२८॥ वह मरकर पृथिवी पर गिर कर खून वमन किया । माया में बद्ध स्कन्द ने माता पिता को मरा हुआ देखकर महाबलवान् स्कन्द शक्ति धारण करके श्रीहरि से युद्ध करने के लिए गये । उस समय मोहित स्कन्द को ब्रह्माजी ने कहा ॥३०॥ ब्रह्माजी ने कहा-- देखों तुम्हारे माता-पिता दूर खड़े होकर इस युद्ध को देख रहे हैं । वे अन्तरिक्ष में लोक साक्षी रूप से अमण कर रहे हैं ॥३१॥ व्यासजी ने कहा-- इस बात को सुनकर और अपने माता-पिता को देखकर स्कन्द अन्तरिक्ष में वहीं अन्तर्धान हो गये । उसके बाद धुन्धु तथा सुन्धु नामक दो बलवान् दैत्य ॥३२॥ श्रीभगवान को मारने के लिए गरुड के ऊपर टूट पड़े । उस समय खड्ग धारण किए हुए धुन्धु को नन्दक नामक कृपाण से तथा गदा धारण किए हुए मुन्धु को अपनी गदा से श्रीमगवान् ने मार दिया । वे दोनों वीर क्षत-विक्षत शरीर वाले होकर पृथिटी पर गिर पड़े ॥३४॥ उस समय मधु अन्धकाराछन्न होकर अन्तर्धान हो गया। और भगवान् विष्णु पर माया से सैकड़ों पर्वतों को गिराया ॥३५॥ उसळे बाद उन सभी पर्वतों को छिन्न-मिन्न करके युद्ध में अन्धकाराच्छत्र हुए मधु के शिर को श्रीभगवान् ने सुदर्शन चक्र से काटकर उसे गिरा दिया ॥३६॥ उसके बाद ब्रह्मा आदि देवता, शङ्करजी तथा देवगण ने श्रीमगवान् के मधुसूदन नाम को लोक में विख्यात कर दिया ॥३७॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के मधु वध नामक बहत्तरवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।७२।। -ण््रार----

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