Srishti Khanda Extracted Page 837
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-837
Sanskrit Original
श्रीपडामहापुराण मुनिदेवा ऊचुः सदा देवैकगोप्ता च हरिरव्यय ईश्वरः ॥१४॥ सर्वसाक्षीत्वय॑ देवो दैत्यजिष्णुर्युगेयुगे । कथं हंति सुरान्सर्वान्कल्पांत इह जायते ॥९५॥ व्यास उवाच एतस्मिन्नंतरे दूरे मधुर्मायां प्रयोजिता । हररूपधरो भूत्वा अबव्रवीद्धरिमव्ययम् ॥१६॥ मधु रुवाच दैत्यानामग्रतः पाप रणे देवान्समंततः। हत्वा किं ते शिवं चाद्य धर्मकीर्तियशोगुणाः ॥१७॥ महतोन्मत्तभावेन नजानासि परान्स्वकान् । अतस्त्वां निशितैबीणैर्नयामि यमसादनम् ॥१८॥ व्यास उवाच एवमुक्त्वा शरैरुग्रैर्जघान केशवं रणे। निचकर्त शरांस्तांस्तु माधवो वाक्यमब्रवीत्॥१९॥ माधव उवाच जानामि त्वां रणे दैत्यं हररूपधरं प्रियम् । शूरं शूरविकर्माणं मधुं मायानियोजितम्॥२०॥ मिथ्यालोकं प्रदास्यामि पातयित्वा रणाजिरे । एतस्मिन्नंतरे तीक्ष्णैः शरैर्विव्याध संयुगे ॥२९॥ जटिलं वृषकेतुं च वृषभस्थं महेश्वरम् । तयोर्युद्धमतीवासीद्देवदानवयोस्तदा ॥२२॥ परस्परं भिंदतोश्च प्राप्तान् प्राप्तान् शरान् शरैः। क्षुरप्रेण धनुस्तस्य चिच्छेद हरिरव्ययः ॥२३॥ ततश्च पातयामास घोटकं वृषरूपिणम् । सदैत्यश्शूलहस्तोथ प्रदुद्राव जगत्पतिम् ॥२४॥ भ्रामयित्वा ततः शूलं जघान परमेश्वरम् । त्रिभिश्चिच्छेद बाणैश्च शूलं कालानलप्रभम्॥२५॥ ततः क्रूरो महाबाहु ् मधुर्मायातिमायिकः । देवीरूपं समास्थाय सिंहस्थ: प्रययौ हरिम् ॥२६॥ शरैर्बहुविधे विष्णुं जघानैवाब्रवीद्ृचः । प्रत्येक युगों में दैत्यों को परास्त करते हैं । ये देवताओं को कैसे मार रहे हें । लग रहा है कि इस समय कल्पांत हो रहा है ॥१५॥ व्यासजी ने कहा-- उसी समय मधु के द्वारा माया की गयी, वह शङ्करजी का रूप धारण करके श्रीमगवान् से कहा मधु ने कहा-- अरे पापी दैत्यों के समक्ष देवताओं को मार कर तुम्हारा कौन सा कल्याण तथा कौन सा धर्म, यश तथा गुण है ॥१७॥ अत्यन्त उन्मत्त होने के कारण अपने और पराये को नहीं जानते हो अतएव में तुमको तीक्ष्ण बाणों से यमलोक पहुँचाता हूँ ॥१८॥ व्यासजी ने कहा-- उसने भयङ्कर बाणों से श्रीभगवान् को मारा, श्रीहरि ने उन बाणों को काट दिया और कहा माधव ने कहा-- मैं जानता हूँ कि तुम दैत्य हो और मेरे प्रिय हर के रूप को धारण किए हो । वीरों के विपरीत कर्म करने वाले वीर मधु हो और माया कर रहे हो ॥२०॥ तुम को रणांगन में मारकर तुम्हें मिथ्या भाषियों का लोक प्रदान करूंगा । व्यासजी ने कहा-- उस समय युद्ध में जटाधारी, बैल पर सवार वृषकेतु महेश्वर को भगवान ने तीक्ष्ण बाणों से वेध दिया उन दोनों देव तथा दानव का अत्यन्त भयङ्कर युद्ध हुआ ॥२१-२२॥ एक दूसरे पर बाणों का प्रहार करके एक दूसरे को छेदते हुए श्रीहरि ने क्षुप्र बाण से उस दैत्येन्द्र के धनुष को काट दिया ॥२३॥ उसके बाद वृष रूपधारी उसके घोड़े को श्रीभगवान् ने गिरा दिया उसके बाद वह दैत्य हाथ में त्रिशूल लेकर श्रीभगवान् पर दौड़ा ॥२४॥ उसने धुमाकर श्रीभगवान् पर त्रिशूल का प्रहार किया । श्रीभगवान् ने तीन बाणों से उस कालाग्नि के समान कान्ति वाले त्रिशूल को तोड़ दिया॥२५॥ उसके बाद अत्यन्त मायावी मधु देवी का रूप धारण करके सिंह पर सवार होकर श्रीहरि के पास गया ॥२६॥ और
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