Srishti Khanda Extracted Page 835

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-835

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Sanskrit Original

eRe श्रीपद्यमहापुराण परस्परं न पश्येति देवासुरगणा भृशम् । सूर्यचंद्रमरहाणां च वह्नीनां च दिवौकसाम् ॥९९॥ तस्मिंस्तमसि दुष्पारे गभस्तिनैंव दृश्यते | दैत्यस्य च ततस्तूर्णं शरैरभ्रिशि्रोपमैः ॥२०॥ विभग्ना: सर्वेदेवाश्च शक्रश्च रणसंमुखे । शरैर्विभिन्नदेहास्तु निपेतुर्धरणीतले ॥२९॥ प्रभग्राश्चापरे शूरास्संयांति च दिशो दश । कूटं तस्यपरिज्ञाय सर्वदेवार्चितो हरिः॥२२॥ सौम्यमस्रं मुमोचाथ दिविसूर्यजशतप्रभम्। विलम्बितं समालोक्य शक्त्या च बहुघंटया ॥२३॥ जघानोरसि दैत्यस्य सपपात व्यथान्वितः । चिरात्संलभ्य संज्ञां च दैतेयः क्रोधमूर्च्छितः ॥२४॥ गत्वा वेगात्सुरश्रेष्ठमैरावतं दघार ह । त्रासयामास सुतरामिंद्रस्य द्विरदं रुषा ॥२५॥ घृत्वा सतु गजं सेद्रं मुमोच धरणीतले । ततो भूमिगतः शक्रः कश्मलं च क्षणं गतः॥२६॥ अवप्लुत्य स दैत्येंद्रो गजदंतांतरस्थितः । शक्रं ग्रहीतुकामस्य वधार्थं यूथपस्य सः ॥२७॥ असिनाऽ सुरमुख्यस्य शिरश्छित्वा न्यपातयत् । सर्वे प्रजहृषुर्देवा गंधर्वा ललितं जगुः ॥ मुदितास्ते च मुनयःस्तुवंति सुरसत्तमम् ॥२८॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे द्वितीयनमुचिवधोनामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥७१॥ स नहीं पाते थे । सूर्य, चन्द्रमा औरअग्नि नामक देवताओं के किरणें उस अन्धकार में दिखायी नहीं पड़ती थो । उसके बाद शाघ्र ही दैत्य के अग्नि के समान बाणों से ॥२०॥ सभी देवता भाग चले केवल युद्ध मे इन्द्र ही थे । बाणों से छिदे हुए शरीर वाले देवता पृथिवी पर गिर पड़े ॥२ १॥ युद्ध में दूसरे वीर दशों दिशाओं में भाग गये । उस दैत्य की माया को जानकर सभी देवताओं से पूजित इन्द्र ने ॥२२॥ आकाश में सैकड़ों सूर्य के समान कान्ति वाले सौम्यास्र को छोड़ा । आकाश में लटके हुए दैत्य को देखकर उन्होंने आठ घण्टों वाली शक्ति से उसके वक्षःस्थल में प्रहार किया जिससे व्यथित होकर वह पृथिवी पर गिर पड़ा । बहुत देर के बाद होश में आकर क्रोध से व्याकुल दैत्य ने ॥२४॥ वेग पूर्वक इन्द्र के पास जाकर ऐरावत को पकड़ लिया और क्रोध करके उसने इन्द्र के हाथी को भयभीत कर दिया ॥२५॥ उसने इन्द्र सहित हाथी को पकड़कर भूमि पर पटक दिया । उसके बाद पृथिवी पर आकर इन्द्र क्षण भर के लिए मूर्छित हो गये ॥२६॥ वह दैत्येन्द्र नीचे कूदकर इन्द्र को पकड़ने के लिए तथा यूथप को मारने के लिए हाथी के दाँतों के भीतर चला गया ॥२७॥ उसी समय इन्द्र ने कृपाण से उस नमुचि के शिर को काट दिया और उसे भूमि पर पटक दिया । यह देखकर सभी देवता प्रसन्न हो गये और गन्धर्वो ने ललित संगीत किया । प्रसन्न होकर मुनियों ने इन्द्र की स्तुति की ॥२८॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के द्वितीय नमुचि वध नामक एकहत्तरवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।\७९।। ——

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