Srishti Khanda Extracted Page 834

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-834

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Sanskrit Original

नमुचिरुवाच प्रकृतं निर्जरं हत्वा न यशोस्ति न च प्रियम् । नलाभकृतकं वापि न जयस्तु पुरन्दर ॥५॥ तस्मात्वयि हतेऽत्रैव सर्व भवति शाश्वतम् । देवराज्यं प्रलप्स्यामि सुखं भोग्यं सुरालये ॥६॥ व्यास उवाच तमब्रवीन्महातेजाः शक्रः परपुरंजयः । इन्द्र उवाच शूरता वाक्यमात्रेण सर्वत्रसुलभा भवेत् ॥७॥। महापराक्रमं यद्वा अस्ति ते दानवाधम। दर्शयस्वाहवे वीर्य पुरं नेष्यामि भास्करेः ॥८॥ व्यास उवाच एतच्छुत्वा महातेजाश्रुकोप दैत्यपुंगवः । पंचभिर्निशितै बाणै र्जघान सुरसत्तमम् ॥९॥ तांस्तु चिच्छेदमघवा क्षुरप्रैः पंचर्भिद्वतम्। जग्मतुस्तौ महावीर्यौ समरे विजयैषिणौ ॥१०॥ अन्योन्यं सहसा वेगाच्छरैश्चिच्छितुः शरान्। बिभिदातेथ गात्राणि विशिखैर्भिदुरोपमैः ॥११॥ अत्यपूर्वं कृतं कर्म ताभ्यामेव रणे भृशम्। लाघवं शरसंधान ग्रहमोक्षं सुदुर्लभम् ॥१२॥ दृष्ट्वा तु विस्मयं जग्मुर्देवासुरगणास्तदा । एतस्मिन्नंतरे दैत्यो मायास्संप्रमुमोच ह॥१३॥ विशिखाः शतशस्तत्र विनिश्चेरुस्समंततः । शक्रः कोपात्पुनः शीघ्रं धनुरुद्यम्य वीर्यवान् ॥१४॥ जघान विशिखैरुग्रैः सर्वगात्रेषुसंज्वलन् । ततोमार्गणसाहस्रै रष्टभिस्त्वधिकं तथा ॥१५॥ बिभिदाते ततोन्योन्यं चिच्छिदाते परस्परम्। शरैर्निरंतसकाशं ददृशुस्तत्र संयुगे ॥१६॥ निपतंति धरापृष्ठे खड्गपातैः सहस्त्रश:। एवं सुदीर्घकाले तु गते तस्मिन्महाहवे ॥१७॥ मायास्त्रं दर्शयामास क्रूरकृन्नमुचिस्तदा । तामसं त्रिषु लोकेषु कृतं स्यात्तुनिरंतरम्॥१८॥ विजय ही होगी ॥४-५॥ तुमको मार देने से मुझे ये सारी बाते मिल जायेंगी । में देवलोक में देवताओं का राज्य सुख तथा भोग्य पदार्थ को प्राप्त कर लूँगा ॥६॥ व्यासजी ने कहा-- शत्रुओं की नगरी पर विजय प्राप्त करने वाले महातेजस्वी इन्द्र उससे बोले इन्द्र ने कहा-- केवल बोलने मात्र से वीर तो सर्वत्र सुलभ है ॥७॥ हे दानव ! यदि तुम्मे महापराक्रम है तो उसे दिखाओं में तुम्हे यमलोक पहुँचा दूँगा ॥८॥ व्यासजी ने कहा-- यह सुनकर महातेजस्वी दानवश्रेष्ठ करुद्ध हो गया । उसने पाँच तीक्षण बाणों से इन्द्र पर प्रहार किया ॥९॥ किन्तु इन्द्र ने शीघ्र ही उन बाणों को अपने पाँच क्षुरप्र बाणों से काट गिराया । वे दोनों महापराक्रमी विजयैषी हो गये ॥१०॥ वे अचानक एक-दूसरे के बाणों को वेगपूर्वक काट रहे थे । उन दोनों के शरीर वज्र सदृश वाणों से छेद गये थे ॥११॥ उन दोनों ने अत्यन्त अभूतपूर्व कर्म किया, बाणों के सन्धान करने तथा छोड़ने में अत्यन्त क्षिप्रता काः प्रदर्शन कर रहे थे॥१२॥ उसको देखकर देवता और असुर सब विस्मित थे । उसी समय दैत्य ने माया का प्रयोग किया ॥१३॥ वहाँ पर सैकड़ों बाण चारो ओर से चलने लगे । उसके बाद इन्द्र ने क्रोध करके धनुष उठाकर ॥१५४॥ अत्यन्त तीब्र बाणों से उसके सम्पूर्ण शरीर में प्रहार किया उसके बाद एक हजार आठ वाणों से ॥१५॥ एक दूसरे का छेदन- भेदन कर दिया । उस समय आकाश बाणों से भर गया ॥१६॥ आकाश से पृथिवी पर हजारो खड्ग गिरने लगे । इस तरह उस महायुद्ध में बहुत अधिक समय बीत जाने पर ॥१७॥ क्रूर कर्म करने वाले नमुचि ने अपने मायात्र का प्रयोग किया । उसके कारण त्रैलोक्य में घोर अन्धकार फैल गया ॥१५८॥ अब देवता और असुर एक दूसरे को देख १०२

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