Srishti Khanda Extracted Page 833
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-833
Sanskrit Original
स च दृष्टवा5 सुरोमृत्युं शूलेनेव जघान ह । शक्तिं चैव ततो मृत्युः प्रचिक्षेप रणाजिरे ॥१६॥ संदह्य सहसा शूलं वह्विकूटसमप्रभम्। दैत्यस्य हृदयं भित्वा गता सा च धरातलम् ॥१७॥ सरथः सपपातोर्व्यां शक्तिजर्जरविग्रहः। अथान्यो दुर्मुखो मृत्युं कृष्टचापो महाबलः ॥१८॥ खड्गचर्मधरः कालो रथ एव गतो भवत्। दृष्ट्वा तं विशिखैः प्राज्यैर्जयान सयमं रणे ॥१९॥ स चाप्लुत्यरथाद्देवो हसिना च सकुंडलम् । शिरश्चिच्छेद सहसा पातयित्वा च भूतले ॥२०॥ हतशेषं बलं सर्व प्रदुद्राव दिशो दश ॥२१॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे देवांतकर्दु्धर्दुर्मगुखवधोनाम सप्ततिमोऽध्यायः ॥७०॥ — te एकहत्तरवाँ अध्याय व्यास उवाच अथान्यो नमुचिः क्रुद्ध: स्यंदनस्थो दिवौकसः । विशिखैरर्दयामास् घोरै राशीविषोपमैः ॥१॥ ततस्तु संयुगे देवाः सिद्धकिन्नरपन्नगाः । न शक्कुवंति बाणानां वेगं सोढुं समंततः॥२॥ रथमुच्चैःश्रवोश्वेन युक्तं मातलिनेरितम्। पुरुहूतः समास्थाय प्रागमत्तं महाबलम् ॥३॥ दृष्ट्वा शक्रं महावीर्य नमुचि दैत्यपुंगवः । अब्रवीद्वासवं संख्ये वचनं सानुगं तदा ॥४॥ उसके बाद यमराज ने शक्ति का उस पर प्रहार किया ॥१६॥ वह शक्ति अग्नि समूह के समान कान्ति वाले उस त्रिशलू को भस्म करके उस दैत्य के हृदय का भेदन करके पृथिवी में प्रवेश कर गयी ॥१७॥ शक्ति के द्वारा शरीर के जर्जर हो जाने के कारण वह दुधर्ष अपने रथ के साथ पृथिवी पर गिर पड़ा । उसके पश्चात् दूसरा दुर्मुख अपनेधनुष को चढाकर तथा हाथ में खड्ग एवं चर्म धारण किए हुए यमराज के रथ पर ही चला गया । उसने यमराज को देखकर बहुत अधिक वाणों से उन पर प्रहार किया ॥१९॥ यमराज भी रथ से कूदकर अपने तलवार से उसकेकुण्डल सहित शिर को काट दिया और उसको प्रथिवी पर गिरा दिया ॥२०॥ मारने से बची हुए दैत्यों की सेना दशों दिशाओं में माग गयी ॥२१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के देवान्तक दुर्धर्ष तथा दुर्मुख वध नामक सत्तरवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।७०।। — ie इन्द्र द्वारा दूसरे नमुचि का वध च्यासजी ने कहा-- उसके वाद दूसरा नमुचि क्रुद्ध तथा रथ पर सवार होकर अपने सर्प के समान बाणों से देवताओं का दलन करने लगा ॥१॥ उस समय युद्ध में सिद्ध, किन्नर तथा पन्नग उसके बाणों के वेग को नहींवर्दास्त कर पा रहे थे ॥२॥ उसके बाद मातलि के द्वारा हाँके गये रथ पर बैठकर इन्द्र उसके समक्ष आ गये ॥३॥ महापराक्रमी इन्द्र को देखकर दैत्य श्रेष्ठ नमुचि युद्ध में इन्द्र से बोला नमुचि ने कहा-- इन सामान्य देवताओं को मारने से न तो मेण यश होगा और न तो मुझको प्रसन्नता होगी, उससे बनावटी लाभ होने वाला है और न तो मेरी
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