Srishti Khanda Extracted Page 832
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-832
Sanskrit Original
रो सृष्टिखण्ड ८०७ देवान्तक उवाच न जानासि महद्धर्म दुष्ट मोहाद्यथाक्रमम् ॥२॥ पापपुण्यप्रयोगेण निग्रहानुग्रहे प्रभ: । अहं च निर्मितो धात्रा करोमि तव शासनम्॥३॥ न जानासि यतो धर्म कालमृत्युपुरः सर: । न रोगो न जरा कालो न मृत्युर्नच किंकरः ॥४॥ धर्मात्रचलितः कर्मी कष्टं याति दिवानिशम्। व्यास उवाच उक्त्वा चैवं महावीर्यं यमं धर्मैकसाक्षिकम् ॥५॥ स जघान त्रिभिर्बाणैः कालमृत्युसमप्रभै: । प्रचिच्छेद सधर्मात्मा ते त्वन्यैर्विशिखैरित्रिभिः ॥६॥ ततस्तूच्चैः शरैप्राज्यैर्युगांतानलसप्रभैः। निजघान यमं संख्ये सचिच्छेदशरैः शरान् ॥७॥ एतस्मिन्नंतरे क्रुद्दो परस्परजयैषिणौ। जघ्नतुः समरेन्योन्यं महाबलपराक्रमौ ॥८॥ अहोरात्रं तयार्युद्धमवर््तत सुदारुणम्। एतस्न्नन्तरे क्रुद्धः शत्तथा प्रशमनं रुषा ॥९॥ विभेद दैत्यशार्दूलो ह्यहंकारयुतो बली । तामेवाथ रुषा धर्मो गृहीत्वाशक्तिकां द्रुतम् ॥१०॥ निजघान तयैवामुंस्तनयोरंतरे भृशम्। सविह्वलितसर्वांगो मुखादागतशोणितः ॥९९॥ ततः क्रुद्धो महातेजा धृत्वादंडं सुदारुणम् । अमोघं पातयामास तस्य॒ दैत्यस्य विग्रहे॥१२॥ साश्चं रथं तथासूतं योद्धारं शस्त्रसंचयम् । चकार भस्मसात्तं च शमनः क्रोधमूर्च्छितः ॥१३॥ पतिते च तथा दैत्ये दुर्धर्षो नाम दानवः । शमनं शूलहस्तस्तु प्रदुद्राव जिघांसया ॥१४॥ शूलहस्तं समायांतं बडवानलसन्निभम् । आससाद रणे मृत्युः शक्तिहस्तोऽति निर्भयः ॥१५॥ देवान्तक ने कहा- हे दुष्टु अज्ञान के कारण तुम धर्म के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते हो ॥२॥ पाप और पुण्य के प्रयोग के द्वारा तुम जीवों पर निग्रह तथा अनुग्रह करते हो । मुझे ब्रह्मा ने बनाया है मैं तुम्हारा प्रशासन कर रहा हूँ ॥३॥। चूकि तुम काल और मृत्यु को आगे करके धर्म को नहीं जानते हो । तुमको न रोग होता है, न जरा होती है, न काल तुम्हारे पास आता है और न मृत्यु, तुम किसी के दास भी नहीं हो ॥४॥ धर्म का पालन नहीं करने वाले तुम्हारे दिन-रात कष्ट से बीतते हैं व्यासजी ने कहा-- इसतरह से एकमात्र धर्म के साक्षी महापराक्रमी यम को इस प्रकार कहकर ॥५॥ यमराज पर काल तथा मृत्यु के समान कान्तिवाले बाणों से प्रहार किया, महात्मा यमराज ने दूसरे बाणों से उन बाणों को काट दिया ॥६॥ उसके बाद अत्यन्त भयंकर युगान्ताग्नि के समान कान्ति वाले बाणों से यमराज को मारा किन्तु यमराज ने उन बाणों को अपने तीन बाणों से काट दिया ॥७। उस समय एक- दूसरे को जीत लेने की इच्छा से क्रुद्ध होकर महाबल एवं पराक्रम सम्पन्न दोनों ने एक दूसरे पर प्रहार किया ॥८॥ उन दोनों का पूरे दिन-रात युद्ध चलता रहा । इसी समय क्रोध से शक्ति के द्वारा देवान्तक ने यमराज पर अहङ्कार पूर्वक प्रहार किया । यमराज ने शीघ्रता से उसी शक्ति को पकड़कर ॥९-१०॥ उसी की छाती में उससे प्रहार किया उससे देवान्तक मूर्छित होकर मुख से खून वमन करने लगा ॥११॥ उसके बाद क्रुद्ध होकर महातेजस्वी यमराज ने अपने अमोघ दण्ड को लेकर उस दैत्य के शरीर पर प्रहार किया । यमराज ने क्रोध करके रथ, घोड़े, सारथि, देवान्तक तथा उसके शस्त्र समूह को भस्म कर दिया ॥१३॥ उसके मर जाने पर दुर्धर्ष नामक दैत्य यमराज को मारने के लिए हाथ में त्रिशूल लेकर दौड़ा ॥१४॥ हाथ में त्रिशूल लेकर आते हुए बाडवाग्नि के समान कान्ति वाले दुर्धर्ष को यमराज ने निर्भय होकर युद्ध में शक्ति से मारा ॥१५॥ वह दैत्य मृत्यु को देखकर उसे त्रिशूल से ही मारा ।
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