Srishti Khanda Extracted Page 831
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-831
Sanskrit Original
तयोस्सवीर्ययोरस्रे धरण्यां प्रणिपेततुः । ततोदैत्यपतिः स्कंदं शरैरम्रिशिखोपमैः ॥१५॥ अर्दयामास सहसा घनघारेव पर्वतम् । तांस्तु च्छित्वा महाबाहुः सेनानीश्चापमस्य वै॥१६॥ विचकर्तार्घचंद्रेण तथा यंतुःशिरो महत् । तथाश्वान्बहुभिर्बाणैः पातयामास भूतले ॥१७॥ गृहीत्वा मुसलं वेगात् सदुद्रावस्थले गुहम् । जघान तेन दैत्येन्द्रः शिखिनं शिखिवाहनम् ॥१८॥ ततो मोहं गतो बहींप्रचकंपे मुहुर्मुहुः । ततः स्कंदः पुनस्तं च जघानासुरपुंगवम् ॥१९॥ प्रचिच्छेदासिना वेगान्मुसलंचातिदाऽणम् । तारेयः शक्तिमादाय जघान क्रौचदारणम् ॥२०॥ सोपि शक्तिं मुमोचाथ अमोघां दुष्टघातिनीम्। ततः संदह्य सा शतक्तिर्विश्रप्रलयकारिणी॥२९॥ यमदंडसपानं च भित्वा पुनर्गुहं गता । सगतासुः पतातोर्व्यां चालयंश्च बसुंधराम् ॥२२॥ पुष्पधूपादिभिः स्कंदः सर्वदेवैः प्रपूजितः ॥२३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे तारेयवधोनामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥६९॥ —— Ne सत्तरवाँ अध्याय व्यास उवाच ततो देवांतको दैत्यो व्यनदत्समरं प्रति। रणं चकार धर्मेण संदष्टौष्टपुटो बली ॥१॥ स गत्वा चाब्रवीद्वाक्यं सर्वलोकविगर्हितम्। में आकाश में टकरा गये ।।१४॥ दोनों पराक्रमियों के अस्तर पृथिवी पर गिर पड़े । उसके बाद तारेय ने स्कन्द को अग्नि शिखा के समान बाणों से पीडित कर दिया । लग रहा था जैसे पर्वत के ऊपर मेघ बरस रहे हों । स्कन्दजी ने उन बाणों को काटकर उसके धनुष को अर्थचन्द्र बाणों से काट दिया और सारथि के शिर को भी काट दिया | फिर अनेक बाणों से उसके घोड़ों को मारकर गिरा दिया ॥१६-१७॥ उसके बाद तारेय मुसल धारण करके स्कन्दजी की ओर दौड़ा । और उससे मयूर तथा स्कन्दजी दोनों पर प्रहार किया ॥१८॥। उसके बाद मयूर मूर्कित हो गया और बार-बार काँपने लगा । तदनंतर स्कन्द ने असुर पर प्रहार किया ॥१९॥ और वेग पूर्वक अत्यन्त भयङ्कर मुसल को कृपाण से काट दिया । तारेय ने शक्ति लेकर स्कन्दजी पर प्रहार किया ॥१९-२०॥ स्कन्दजी ने कभी विफल नहीं होने वाली और वीरों को मारने वाली शक्ति का प्रहार किया । उसके बाद विश्व का प्रलय करने वाली वह शक्ति उसको भस्म करके यमदण्ड के समान स्कन्दजी के पास लौट गयी । तारेय भी मरकर पृथिवी को कॅपाता हुआ गिर पड़ा ॥२२॥ सभी देवताओं ने स्कन्दजी की धूप तथा दीप से पूजा की । इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के तारेयवध नामक उनहत्तरबें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ६९।। 7 देवान्तक, दुधर्ष तथा दुर्मुख का वध व्यासजी ने कहा-- उसके बाद देवांतक नामक दैत्य युद्ध में गरजने लगा । वह अपने ओठों को चबाते हुए धर्मराज के साथ युद्ध करने लगा ॥१॥ वह धर्मराज के पास जाकर सभी लोकों में निन्दित वाक्य को कहने लगा
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