Srishti Khanda Extracted Page 830
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-830
Sanskrit Original
उनहत्तरवाँ अध्याय व्यास उवाच तारेयो बलसंपन्नः शक्रतुल्यपराक्रम: । जघान विशिखैस्स्कन्द॑ पितृघातिनमाहवे ॥१॥ ततस्स्कन्दो महाबाहुर्हरितुल्यपराक्रमः । विचकर्त शरांस्तांस्तान्निर्विभेद शरोत्तमैः ॥२॥ सदैत्यस्सहसा स्कंदं छादयामास मार्गणैः । असंभ्रान्तः प्रचिच्छेद विशाखो विशिखैस्तदा।।३॥ तारेयोग्रिशरैः स्कंदं जघान रणमूर्धनि । विशिखं भिदुरप्रख्यं चखान हरनंदने ॥४॥ वैश्वानरेण सेनानीस्तत्र संपर्यवारयत्। रौद्रमस्त्रं पुनर्दैत्यः प्रेषयामास तं प्रति॥५॥ तन्निरस्तं कृतं तेन बाणेनास्फालितेन च । अधोरं प्राक्षिपद्दैत्यो धोररूपं सुदारुणम् ॥६॥ भूधराविटपास्िंहास्तथा सर्पादयः शराः। धावति पार्वतीपुत्रं कोटिकोटिसहस्रशः ॥७॥ छित्वा तांस्तु शरान् स्कंदो बिभेद दैत्यपुंगवम् । आपादंशीर्षपर्यत॑ शरैरग्न्यर्कसन्निभैः ॥८॥ स्वर्णपुंखाः शरा लग्ना देहेदैत्यपतेर्भृशम् । रेजुस्तेस्वर्णशकला यथा कृष्णशिलोच्चये ॥९॥ तस्यदेहात्ततश्चैव बहुसुस्रावशोणितम् । यथा च माधवे मासि पुरुपुष्पशशमीतरुः ॥१०॥ स्यंदनाधश्चराश्वाश्च शिश्यिरे भूमिलाग्नरकाः । अथ क्कुद्धो महादैत्यः शूलं भीमं च दारुणम्॥९९॥ धृत्वा तं प्रतिचिक्षेप कालमृत्युसमप्रभम्। पार्वतीनंदनेनापि शूलं पाशुपतेन ह ॥१२॥ क्षिप्तं तेन कृतं दग्धं मूहर्तेन रणाजिरे । पुनः शक्तिं मुमोचाथ ब्रह्मदत्तान्तु दानवः ॥१३॥ शूलं प्रतिजघानाथ शतकूटसमप्रभम् । ततोऽस्तरे वञ्रसंकाशे जघटाते वियत्यपि ॥१४॥ तारेय वध व्यासजी ने कहा-- तारेय इन्द्र के ही समान बलवान् था । उसने अपने पिता को मारने वाले स्कन्द को वाणों से मारा ॥१॥ उसके बाद श्रीहरि के समान पराक्रम वाले स्कन्दजी ने उन बाणों को काट दिया तथा तारेय को अपने उत्तम बाणों से बेध दिया ॥२॥ उस दैत्य ने आचानक स्कन्दजी को अपने बाणों से ढंक दिया और उसने सावधानी पूर्वक स्कन्दजी को बाणों से छेद दिया । तारेय ने अग्नि बाणों से स्कन्द को मारा और उसने उनके शरीर में वज्र के सदृश बाण का प्रहार किया ॥४॥ उस समय स्कन्द ने उन बाणों को अग्न्यस्न से खण्डित किया । उसके बाद तारेय ने स्कन्द पर रौद्रास्त्र का प्रहार किया ॥५॥ उसको स्कन्दजी ने स्फालित बाण से शान्त कर दिया । दैत्य ने भयङ्कर रूप वाले अघोराख्र का प्रयोग किया तो उस समय स्कन्दजी की ओर हजारों पर्वत, वृक्ष, सिंह तथा सर्प आदि उस बाण से निकलकर स्कन्दजी की ओर दौड़ने लगे ॥६-७॥ उन बाणों को काटकर स्कन्दजी दैत्य श्रेष्ठ तारेय को पैर से लेकर शिर पर्यन्त अग्नि तथा सूर्य के समान कान्ति वाले बाणों से छेद दिया ॥८॥ जिनके सुवर्ण निर्मित पुंख वाले वाण काले-काले दैत्य के शरीर में लगकर काली शिला में लगे हुए स्वर्ण के टुकड़ों जैसे शोभते थे ॥९॥ उस समय तारेय के शरीर से बहुत अधिक खून उसीतरह निकला जिसतरह शमी के वृक्ष में चैत्र के महीने में लाल-लाल फूल निकलते हैं ॥१०॥ उसके रथ में जुते हुए घोड़े परथिवी पर सो गये । उसके बाद महादैत्य भयङ्कर त्रिशूल धारण करके कालाग्नि के समान कान्ति वाले उसे स्कनदजी पर चलाया । स्कन्दजी ने भी ॥११-१२॥ त्रिशूल को उप्त पाशुपत पर चलाया । उस त्रिशुल ने तारेय के त्रिशूल को भस्म कर दिया । फिर दानव ने ब्रह्माजी द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रहार स्कन्दजी के त्रिशूल पर किया ॥१३॥ जो सौ कूटों के समान कान्ति वाली थी । वे दोनों असर आपस
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