Srishti Khanda Extracted Page 828

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-828

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Sanskrit Original

तया विनिहतः शक्रः प्रचचाल गजोपरि । लब्धसंज्ञो बलं जिष्णुर्विभेद दनुजं क्षणात् ॥३८॥ रथसंस्थस्य हस्तौ च धनुश्चिच्छेद चेषुणा। चर्मतीक्ष्णं ध्वजं तस्य शरेणैकेन वीरहा ॥३९॥ चतुर्भिर्निशितैर्बाणैर्विव्याध चतुरो हयान् । शरेणैकेन सूतस्य शिरश्चिच्छेद तत्क्षणात् ॥४०॥ छिन्नधन्वा हतरथो हताश्वो हतसारथिः । निपत्य मूर्च्छितः पृथ्व्यां मुहू्तन्मित्युमाप सः ॥४१॥ अथ क्रुद्धो महादैत्यो नमुचिः सुरदर्पहा । गदामादाय सहसा स जघान महागजम् ॥४२॥ यथामेरुगिरेः शृंगे वञ्रपातो भवेद् ् रुवम्। तथैव च महाशब्दो ह्यभवल्लोमहर्षणः ॥४३॥ प्रहारेणार्दितः पद्मी संचचाल सविह्वलः। रुधिरेणावसिक्तांगो विमुखो वेदनातुरः ॥४४॥ शतक्रतुं विधावति शतशोऽ थसहस्रशः । अर्थचंद्रै: क्षुरप्रैश्च चिच्छेद पाकशासनः ॥४५॥ जंतुभिस्तस्य मायाभिरर्दितास्सुरपुंगवाः । भूमौ निपतिताः केचित्केचित्सुप्ता रथोपरि ॥४६॥ ृ ष्ट्वास्य महत्कर्म माधवो विशिखांस्तथा। जंतुभूतान्सचक्रेण चिच्छेद देहलम्नकान् ॥४७॥ ततोजिष्णुस्त्रिभिर्बाणैः पातयामास भूतले। पृथिव्यां पतितो दैत्यो मूच्छितस्खलितः पुनः ॥४८॥ दधार मुद्ररं घोरं शक्रं हंतुं समुद्यतः । ततो जघान मधवा कुलिशेन महासुरम्॥४९॥ सपपात महीपृष्ठे क्षतवक्षा महाबलः | साधुसाध्वति देवाश्च सिद्धाश्चैव महर्षयः ॥५०॥ अपूजयंस्तदा शक्रं बहुभिः पुष्पवृष्टिभिः । ततो दैत्यगणाः सर्वे भीतास्तत्र प्रदुद्रुवुः ॥ गीतं गायंति गंधर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥५१॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखण्डे बलनमुचिवधोनामसप्तषष्ठितमो5ध्याय: ॥६७॥ -कणश्रिई--- को-क्षण भर में छेद डाला ॥३८॥ वीरों को मारने वाले इन्द्र ने रथ पर बैठे हुए बल के दोनों हाथों को तथा धनुष को अपने बाणों से काट डाला । उसके ढाल तथा पताका को भी एक ही बाण से काट दिया ॥३९॥ चार तीक्ष्ण बाणों से चार घोड़ों को मार दिया और उसी क्षण उसके सारथि को एक बाण से मार दिया ॥४०॥ कटे हुए धनुष वाला टूटे रथ वाला तथा मरे हुए सारथि वाला बल पृथिवी पर गिरकर मर गया ॥४१॥ उसके बाद देवताओं के दर्प को विनष्ट करने वाला नमुचि क्रुद्ध होकर गदा लेकर इन्द्र के हाथी पर प्रहार किया ।४२॥ जिस तरह सुमेरु पर्वत के शिखर पर वज्रपात हुआ हो उसी तरह का भयङ्कर शब्द उस गदा प्रहार से हुआ ॥४३॥ उस प्रहार से ऐरावत काँण कर मूर्छित हो गया । उसका सारा शरीर खून से भिंग गया और वह हाथी रण पराङ्मुख हो गया ॥४४॥ इन्द्र के पीछे हजारों दैत्य दौड़ने लगे । इन्द्र ने उन सबों को हजारो अर्द्ध चन्द्र बाणों से काट दिया ॥४५॥ उस दैत्य के मायाओं ने बड़े-बड़े देवताओं को पीडित कर दिया । कुछ देवता पृथिवी पर गिर पड़े कुछ अपने रथ पर ही सो गये॥४६।। उसके इस महान कर्म को देखकर तथा जन्तु रूप बाणों को देखकर माधव ने उसे अपने चक्र से काट दिया उसके बाद इन्द्र ने अपने तीन बाणों से मार कर उसको पृथिवी पर गिरा दिया । पृथिवी पर गिरकर वह दैत्य मूर्छित होकर लड़खड़ा गया ॥४८॥ उसके बाद उसने इन्द्र को मारने के लिए गदा उठाया । तो इन्द्र ने नमुचि को अपने वज्र के प्रहार से मार दिया ॥४९॥ उसके बाद छाती के विदीर्ण हो जाने से महाबलवान् वह पृथिवी एर गिर पड़ा । महर्षि तथा सिद्धगण बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कहने लगे । उन लोगों ने पुष्प की वृष्टि करके इन्द्र की पूजा की। उसके बाद दैत्य समूह भयभीत होकर पलायन कंर गया । गन्धो ने गीत गाया और अप्सराओं ने नृत्य किया ॥५१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के बल तथा नमुचि वध नामक सड़सठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ६७।। —

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